SIR पर खुलासे के बाद भड़के संजय सिंह, कहा- ज्ञानेश कुमार को जेल में डालो

SIR पर खुलासे के बाद भड़के संजय सिंह, कहा- ज्ञानेश कुमार को जेल में डालो

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को जेल भेजने की मांग की है. उन्होंने कहा कि 14 बार असहमति की बात सामने आ रही है और हर बार यही बात उभरकर आ रही है कि दो चुनाव आयुक्त यह कह रहे हैं कि आपका यह तरीका गलत है. इस तरह वोटों को डिलीट करना और वोटों को जोड़ने का जो केंद्रीकृत तरीका बनाया जा रहा है, वह ठीक नहीं है और ज्ञानेश कुमार एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं.

राज्यसभा सांसद ने कहा कि दूसरी बात यह है कि चुनाव का मतलब अब क्या बचा? बिहार चुनाव के पहले भी मैंने कहा था कि सिर्फ जीत का प्रमाण पत्र देना बाकी रह गया है. एसआईआर के बाद तो अब चुनाव का कोई मतलब ही नहीं बचा. अगर आप एक कॉन्स्टिट्यूएंसी में 50 हजार वोट उड़ा दे रहे हैं और 8 हजार, 5 हजार वोटों के अंतर से बीजेपी जीत जा रही है, तो आप जीत का ढोल पीटते रहिए, लेकिन वह चुनाव कहां हुआ? वह तो लूट हुई. यह एक प्रकार से लूट हुई और यह लूट सरकार और ज्ञानेश कुमार मिलकर कर रहे हैं. इसका मतलब पीएम नरेंद्र मोदी  की लोकप्रियता से चुनाव नहीं जीता गया है. ये सारे चुनाव लूटप्रियता के कारण जीते गए हैं. उन्होंने चुनावों की लूट की है.

उन्होंने कहा कि  आपने 60 लाख नाम काट दिए, फिर 33 लाख नाम जोड़ दिए, फिर 27 लाख नाम पेंडिंग कर दिए और फिर आपने कहा कि एफिडेविट देकर सुनवाई हो गई. 1 लाख 26 हजार की सुनवाई हुई और उसमें से 93 प्रतिशत सही पाए गए. तो इसका मतलब जिन नामों को आपने काटा और जिनके मताधिकार से आपने उन्हें वंचित किया, बंगाल के अंदर उस अपराध के लिए जेल कौन जाएगा?

उन्होंने पूछा कि गिरफ्तारी किसकी होगी? ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करके जेल में डालना चाहिए. इस चुनाव आयुक्त के रहते हुए, ज्ञानेश कुमार के रहते हुए देशभर में कोई चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकते. अब तक जितने चुनाव कराए गए हैं, चाहे बिहार का हो, बंगाल का हो, दिल्ली का हो, हरियाणा का हो या महाराष्ट्र का, सबके सब चुनाव कैंसिल होने चाहिए और दोबारा चुनाव इस देश के अंदर होना चाहिए. वरना लोकतंत्र का अब कोई मतलब नहीं बचता. आपने लाखों नाम अपनी मर्जी से जोड़ दिए और लाखों नाम अपनी मर्जी से काट दिए.

‘ये कौन सी प्रक्रिया है आपकी?’

सिंह ने कहा कि एसडीएम के पास इसका एक्सेस नहीं है. राज्यों में जो अधिकारी हैं, वे न तो नाम जोड़ सकते हैं और न घटा सकते हैं. तो ये कौन सी प्रक्रिया है आपकी? यह तो लूट की प्रक्रिया है. इतनी जटिल प्रक्रिया इन्होंने जानबूझकर इसलिए बनाई है कि कोई उस प्रक्रिया को पूरी ही न कर सके. आप दिल्ली में हालत देखिए. सेना के पूर्व प्रमुख का नाम कट गया. देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का नाम कट गया. अरविंद केजरीवाल तीन बार मुख्यमंत्री रहे, उनके पूरे परिवार का नाम कट गया. मनीष सिसोदिया जी के परिवार का नाम कट गया. कपिल सिब्बल जी यहां से चुनाव लड़ चुके हैं, उनका नाम कट गया और उनको नोटिस मिल गई. तो ये कौन सी प्रक्रिया है आपकी?

दिल्ली एसआईआर के संदर्भ में सिंहव ने कहा कि आपने विदेश मंत्री का नाम काट दिया, आपने विदेश सचिव का नाम काट दिया. रेखा गुप्ता का नाम काट दिया. खुद चुनाव आयुक्त संधू का नाम काट दिया. तो ये कौन सी प्रक्रिया है भाई? ये क्या कर रहे हैं आप? यह कौन सा एसआईआर है? यह कौन सा गहन पुनरीक्षण है? यह तो पूरी तरह से लूट है. और मुझे अफसोस इस बात का है कि सुप्रीम कोर्ट आंख पर पट्टी बांधकर बैठा हुआ है. सुप्रीम कोर्ट भी इस पूरे मामले में धृतराष्ट्र बना हुआ बैठा हुआ है.

उन्होंने कहा कि जब इन्होंने कहा कि 93 प्रतिशत नाम सही पाए गए, तो यही तो सुप्रीम कोर्ट है जिसने कहा था कि अगली बार वोट दे लेना. 27 लाख वोटर्स से कहा कि अगली बार वोट देना. अब वे सही वोटर थे, 93 प्रतिशत उसमें से सही पाए गए. यह खुद चुनाव आयुक्त कह रहा है. तो समझ लीजिए कि देशभर में क्या चुनाव हुआ है.

इन दावों पर क्या बोला चुनाव आयोग?

दरअसल, अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि SIR पर दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जाहिर की लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उनकी मांगों को अनसुना कर दिया. वहीं इस रिपोर्ट को भारत निर्वाचन आयोग ने खारिज कर दिया है. सूत्रों के अनुसार आयोग ने कहा कि – मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा, लेकिन फैसले आम सहमति से हुए!! चुनाव आयोग के सूत्रों के मुताबिक पिछले साल 2 साल में चुनाव आयोग ने एक दो नहीं बल्कि दर्जनों या यह कहें कि 100 से ज्यादा फैसले लिए.

सूत्रों ने कहा कि कई मुद्दों पर चुनाव आयुक्त में मत भिन्नता रहती है लेकिन उसके बाद में हर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा होती है और चर्चा के बाद ही कोई फैसला होता है. जिन मुद्दों का ज़िक्र न्यूज़ रिपोर्ट में किया गया है उन मुद्दों पर भी मत भिन्नता हो सकती है और रही होगी लेकिन इसका मतलब यह नहीं की फैसला एक तरफ लिया गया, कोई भी फैसला लिया गया है तो वह आम सहमति से लिया गया है जिस पर तीनों चुनाव आयुक्त के हस्ताक्षर हैं. बिना बहुमत या आम सहमति के कोई फैसला नहीं किया जा सकता

Leave a Reply