कोविड-19 मरीजों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन से कोई लाभ नहीं?

 

 

  • मेडिकल रिसर्च मैगजीन द लैंसेट ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के असर पर सवाल उठाया
  • पत्रिका ने कहा कि कोविड-19 मरीजों को यह दवा खिलाने पर मृत्यु दर बढ़ रही है
  • उसने 15 हजार लोगों पर रिसर्च करने के बाद आए रिजल्ट का हवाला दिया
  • इधर, भारत सरकार ने कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए HCQ के इस्तेमाल का दायरा बढ़ा दिया

नई दिल्ली
स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनियाभर के रिसर्च प्रकाशित करने वाली मशहूर पत्रिका द लैंसेट का कहना है कि कोविड-19 मरीजों के इलाज में मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल आने वाली दवा क्लोरोक्वीन और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) से फायदा मिलने का कोई सबूत नहीं मिला है। उसने ताजातरीन रिसर्च का हवाला देकर दवा किया कि मर्कोलाइड के बिना या उसके साथ भी ये दोनों दवाइयों के इस्तेमाल से कोविड-19 मरीजों की मृत्युदर बढ़ जाती है। पत्रिका ने कहा कि ताजा रिसर्च करीब 15 हजार कोविड-19 मरीजों पर किया गया है। लैंसेट के इस दावे पर ट्विटर पर सवाल उठने लगे हैं। कुछ लोगों ने पत्रिका को पक्षपाती करार दिया है। इधर, भारत सरकार ने कोविड-19 से बचाव के लिए HCQ के इस्तेमाल का बढ़ाने का फैसला किया।

जिंक के साथ HCQ ले रहे हैं ट्रंप
ध्यान रहे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी महीने की शुरुआत में भारत से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा के निर्यात पर पाबंदी हटाने की मांग की थी। इसी हफ्ते उन्होंने बताया कि वो कोरोना वायरस से बचाव के लिए जिंक (Zinc) के साथ मलेरिया रोधी दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन ले रहे हैं। इससे पहले अमेरिका सरकार के विशेषज्ञों ने भी कहा था कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना वायरस के संक्रमण से होने वाली बीमारी कोविड-19 के इलाज में कारगर नहीं है।

लैंसेट ने शोध के हवाले से क्या कहा
बहरहाल, लैंसेट ने कहा कि चूंकि रिसर्च में क्लोरोक्वीन और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन से कोविड-19 मरीजों को फायदा नहीं पहुंचने की बात साबित हो चुकी है, इसलिए अब क्लीनिकल ट्रालय के सिवा इसके इस्तेमाल पर रोक लगनी चाहिए। शोधकर्ताओं से हवाले से लैंसेट ने कहा कि रैंडमाइज्ड ट्रायल और उसके नतीजों की जानकारी तुरंत सामने आनी चाहिए। पत्रिका ने शोधकर्ताओं सी फंक-ब्रेंटानो और जे सलेम की टिप्पणी साझा की। उसने लिखा, ‘प्राथमिक रिपोर्टों के साथ आए नतीजों से पता चलता है कि क्लोरोक्वीन और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को अकेले या फिर अझिथ्रोमाइसिन के साथ खाना लाभदायक नहीं है। इसे खाने से अस्पताल में भर्ती कोविड-19 मरीजों को नुकसान हो सकता है।’

लैंसेट के दावे पर उठ रहे सवाल
इस पर @DarylT ट्विटर हैंडल ने कहा कि इस इलाज के बारे में मैंने जितना पढ़ा उसके मुताबिक कोविड-19 बीमारी के शुरुआती लक्षण का पता लगते ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन खाने से फायदा होता है। साथ ही, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन पहले ही खा लें तो कोरोना का संक्रमण नहीं होता है। अस्पताल में भर्ती मरीजों को खिलाने पर निःसंदेह इसका असर नहीं होता है।

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वहीं, @MattMorrisPoet ट्विटर हैंडल ने कहा कि सिर्फ 15 हजार लोगों पर स्टडी की गई? यानी, सिर्फ न्यूयॉर्क में कोविड-19 से हुई मौतों से भी आधे लोगों पर। इसने लैंसेट से सवाल किया, आपने इतनी जल्दी 15 हजार लोगों के डेटा कैसे जुटा लिए? स्वाभाविक है कि वो सभी एक ही जगह पर तो नहीं होंगे।

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वहीं, एक और ट्विटर हैंडल @ClaraLpz3 ने कहा, ‘HCQ का इस्तेमाल जिंक और अझिथ्रोमाइसिन के साथ ही करना चाहिए। इटली में जब से इसका इस्तेमाल शुरू हुआ, लोगों को अस्पतालों में भर्ती करवाने की नौबत नहीं रह गई।’ इसने लैंसेट को सीधे-सीधे पक्षपाती बताया और कहा, ‘इसलिए दूर हटो बायस्ड लैंसेट और अपने लेखों को भी हटाओ।’

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भारत ने बढ़ाया HCQ के इस्तेमाल का दायरा
दिलचस्प बात यह है कि भारत में स्वास्थ्यकर्मियों को कोरोना से बचाव के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन (HCQ) के इस्तेमाल की अनुमति मिली हुई है। भारत सरकार ने गुरुवार को इसके इस्तेमाल को लेकर जारी अडवाइजरी में बदलाव करते हुए इसका दायरा बढ़ा दिया। सरकार ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान (ICMR) की तरफ से कोविड-19 के लिए गठित नैशनल टास्क फोर्स द्वारा HCQ के सुरक्षित इस्तेमाल के नतीजों की समीक्षा के बाद यह फैसला लिया।

HCQ के इस्तेमाल पर रोक का इरादा नहीं: ICMR
वहीं, खुद आईसीएमआर ने शुक्रवार को स्पष्ट कहा कि इसके इस्तेमाल पर फिलहाल रोक लगाने का कोई इरादा नहीं है। आईसीएमआर ने इस पर हुई कई स्टडीज के हवाले से कहा है कि इसे लिए जाने पर हेल्थ वर्कर्स में कोरोना संक्रमण के मामले कम नजर आए। काउंसिल का कहना है कि इसे डॉक्टर की सलाह पर लिए जाने की जरूरत है और इसका सेवन शुरू करने से पहले ईसीजी किया जाना जरूरी है।

 
 

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