रूसी तेल खरीद पर अमेरिका की नई आपत्ति, भारत ने दोहराया अपना रुख; कहा- ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों से तय होगी
रूस से कच्चे तेल के आयात को लेकर भारत और अमेरिका के बीच एक बार फिर मतभेद उभरते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिए हैं कि ट्रंप प्रशासन रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों में दी गई उन विशेष छूटों और व्यवस्थाओं को समाप्त करना चाहता है, जिनकी वजह से भारत सहित कुछ देश रूसी तेल खरीद पा रहे हैं।
अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति की सुनवाई के दौरान रुबियो ने कहा कि प्रशासन का लक्ष्य रूस से जुड़े ऊर्जा कारोबार को सीमित करने के लिए मौजूदा छूटों को जल्द खत्म करना है। उनके इस बयान ने भारत की ऊर्जा नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बदलता रहा पश्चिमी देशों का रुख
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। उस दौरान पश्चिमी देशों ने भारत द्वारा रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदने की आलोचना भी की, लेकिन कई मौकों पर इसे वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता के लिए आवश्यक कदम बताया गया।
विशेषज्ञों का मानना था कि भारत समेत कुछ देशों द्वारा रूसी तेल की खरीद जारी रहने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति बनी रही और वैश्विक कीमतों में बेकाबू उछाल नहीं आया। साथ ही रूस को भी बाजार मूल्य से कम कीमत पर तेल बेचना पड़ा, जिससे उसकी आय प्रभावित हुई।
फिर सख्त हुआ अमेरिकी रुख
हाल के महीनों में अमेरिका ने रूसी तेल को लेकर अपना रुख और कड़ा किया है। वॉशिंगटन का दावा रहा है कि भारत ने रूसी तेल की अतिरिक्त खरीद से बचने को लेकर कुछ आश्वासन दिए हैं। हालांकि भारत लगातार यह स्पष्ट करता आया है कि ऊर्जा आयात से जुड़े फैसले पूरी तरह राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
नई दिल्ली का कहना है कि देश की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है और किसी भी निर्णय का आधार भारतीय उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था के हित होते हैं।
दोहरे मानदंडों पर उठ रहे सवाल
अमेरिका के बदलते रुख को लेकर भारत में कई रणनीतिक विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि जब वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि की आशंका थी, तब भारत की रूसी तेल खरीद को बाजार को स्थिर रखने वाला कदम माना गया था, लेकिन अब वही नीति आलोचना का विषय बन रही है।
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में मार्को रुबियो ने स्वयं कहा था कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य भारत को निशाना बनाना नहीं है। विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका रूस पर दबाव बनाए रखने और भारत के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है।
भारत ने दोहराई रणनीतिक स्वायत्तता की नीति
भारत का स्पष्ट मत है कि वह एक संप्रभु राष्ट्र है और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार रखता है। सरकार का कहना है कि सस्ती, भरोसेमंद और पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध कराना देश की आर्थिक प्रगति और नागरिकों के हितों से जुड़ा मुद्दा है।
भारतीय नेतृत्व लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर जोर देता रहा है। इसी नीति के तहत भारत किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में अपनी विदेश या ऊर्जा नीति तय करने के पक्ष में नहीं है।
चीन का मुद्दा भी चर्चा में
रूसी ऊर्जा आयात को लेकर चीन का नाम भी लगातार चर्चा में बना हुआ है। कई भारतीय विश्लेषकों का कहना है कि चीन आज भी रूस का बड़ा ऊर्जा खरीदार है, लेकिन उसके खिलाफ अमेरिका अपेक्षाकृत अधिक सतर्क रुख अपनाता दिखाई देता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक चीन की विशाल आर्थिक ताकत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी अहम भूमिका के कारण अमेरिका उसके खिलाफ कठोर कदम उठाने से बचता है। इसी वजह से भारत में कुछ वर्गों के बीच यह धारणा बन रही है कि अंतरराष्ट्रीय नियम और दबाव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किए जाते।
केवल तेल नहीं, स्वतंत्र नीति का भी सवाल
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद अब केवल तेल आयात तक सीमित नहीं है। इसे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति, आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
भारत अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन साथ ही वह अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर किसी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में रूसी तेल को लेकर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच नई दिल्ली का संदेश पहले की तरह स्पष्ट है—भारत अपनी जरूरतों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही ऊर्जा संबंधी फैसले करेगा।
