अयोध्या में भूमि अधिग्रहण को लेकर हाई कोर्ट का अहम फैसला, सरकार और प्रशासन को दिए सख्त निर्देश

अयोध्या में भूमि अधिग्रहण को लेकर हाई कोर्ट का अहम फैसला, सरकार और प्रशासन को दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने बुधवार को अयोध्या में उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद की विभिन्न योजनाओं के लिए जारी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पर रोक लगा दी. अदालत ने राज्य सरकार और जिले के अधिकारियों सहित सभी पक्षों को निर्देश दिया कि वे संबंधित स्थलों पर यथास्थिति बनाए रखें. इस मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल को होगी.

न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मनजीव शुक्ला की खंडपीठ ने 11 समान याचिकाओं पर यह आदेश जारी किया. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अपनी दलीलें पूरी कर लीं लेकिन जब जवाब देने के लिए कहा गया तो राज्य सरकार के आवास एवं शहरी विकास विभाग, अयोध्या के जिलाधिकारी और परिषद की ओर से पेश वकीलों ने बुधवार को अपनी दलीलें शुरू करने में असमर्थता जताई.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया फैसला

पीठ ने इस बात पर संज्ञान लिया और कहा कि यह मामला काफी समय से लंबित है और इसमें अनावश्यक स्थगन उचित नहीं होगा. पीठ ने निर्देश दिया कि अगर राज्य या आवास एवं विकास परिषद अगली तारीख पर अपनी दलीलें पेश करने में विफल रहते हैं तो वे इसके बजाय लिखित दलीलें दाखिल कर सकते हैं.

याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, अयोध्या में जमीन अधिग्रहण उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद अधिनियम, 1965 के तहत किया जा रहा है. याचिकाओं में बताया गया कि इस कानून में यह प्रावधान है कि अधिग्रहण से संबंधित लाभ कानून के तहत उपलब्ध अधिक लाभकारी प्रावधानों के अनुरूप होने चाहिए.

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में रखी दलील

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ अधिक मुआवजा और पुनर्वास, पुनर्स्थापन व सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन जैसे अतिरिक्त सुरक्षा उपाय प्रदान करता है.

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वर्ष 1965 के अधिनियम के तहत जिस तरीके से भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है उससे जमीन मालिकों और किसानों को इन बढ़े हुए लाभों से वंचित होना पड़ेगा और इसके परिणामस्वरूप जमीन का अधिग्रहण बहुत कम कीमतों पर होगा.

पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि वर्ष 1965 के अधिनियम के तहत अधिग्रहण की प्रक्रिया साल 2013 के कानून की तुलना में कम लाभकारी प्रतीत होती है. पीठ ने इसे देखते हुए वर्ष 2020 और उसके बाद जारी अधिसूचनाओं के तहत शुरू की गई अधिग्रहण प्रक्रिया पर रोक लगाने का आदेश दिया.

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