अरविंद केजरीवाल ने इन 25 प्वाइंट्स में बताया जस्टिस स्वर्णकांता के सामने नहीं होंगे पेश, फिर लगाए गंभीर आरोप
New Delhi : दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक विस्तृत पत्र लिखकर दिल्ली आबकारी नीति के मामले की सुनावई के लिए आगे की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार कर दिया है. उन्होंने यह फैसला अपने ‘अंतःकरण’ और ‘न्यायिक निष्पक्षता पर उठे सवालों’ के आधार पर लिया है.
केजरीवाल ने पत्र में कहा कि यह कदम किसी गुस्से या असम्मान के कारण नहीं, बल्कि न्यायपालिका के प्रति सम्मान और आम नागरिक के विश्वास को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है. उन्होंने लिखा कि पिछले 75 वर्षों में जब अन्य संस्थाएं कमजोर पड़ीं, तब जनता ने न्यायपालिका पर भरोसा किया है, और उनका उद्देश्य उसी भरोसे को मजबूत करना है.
आइए हम आपको उन 25 बिंदुओं के बारे में बताते हैं जिसका जिक्र अरविंद केजरीवाल ने अपने पत्र में किया है.
1. मैं यह पत्र आपके पद और न्यायपालिका संस्था के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ लिख रहा हूँ. सबसे पहले मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह पत्र न तो किसी क्रोध, न ही असम्मान या व्यक्तिगत टकराव की भावना से लिखा गया है. बल्कि यह पीड़ा, विनम्रता और न्यायपालिका की भूमिका में गहरे विश्वास के साथ लिखा गया है. यह पत्र एक बड़े प्रश्न से जुड़ा है-न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता में आम नागरिकों का विश्वास.
2. पिछले 75 वर्षों में जब-जब अन्य संस्थाएं कमजोर पड़ीं, तब-तब देश की जनता ने न्यायपालिका से आशा की. न्यायपालिका ने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की है. मेरा उद्देश्य केवल न्यायपालिका को मजबूत करना है, न कि उसे कमजोर करना.
3. इसी भावना से मैंने पहले इस मामले में न्यायाधीश के स्वयं को अलग करने का अनुरोध किया था. मुझे आशंका थी कि न्याय न केवल हो, बल्कि होता हुआ दिखे भी. 20 अप्रैल 2026 को उस आवेदन के खारिज होने के बाद भी मेरी आशंकाएं दूर नहीं हुईं. मुझे यह पीड़ादायक अनुभव हुआ कि मेरी वैध चिंता को व्यक्तिगत आक्षेप के रूप में लिया गया.
4. मैं महात्मा गांधी के सत्याग्रह सिद्धांत से प्रेरित हूँ-पहले संवाद, फिर आत्ममंथन, और अंततः यदि अन्याय बना रहे तो शांतिपूर्ण विरोध. सत्याग्रह अहंकार नहीं, बल्कि अंतःकरण की शांत अभिव्यक्ति है.
5. इसी भावना से मैं यह पत्र लिख रहा हूँ.
6. मेरे आवेदन में दो प्रमुख चिंताएं थीं-
(i) आपका आरएसएस से जुड़े संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से सार्वजनिक जुड़ाव.
(ii) आपके दोनों बच्चों का केंद्र सरकार के पैनल में वकील होना, जबकि इस मामले में केंद्र सरकार और सीबीआई विपक्षी पक्ष हैं.
7. विशेष रूप से, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा आपके बच्चों को मामलों का आवंटन किया जाना, और बड़ी संख्या में केस मिलना, हितों के टकराव की गंभीर आशंका पैदा करता है.
8. इतने अधिक मामलों से भारी आर्थिक लाभ होना स्वाभाविक है, जो करोड़ों रुपये तक हो सकता है.
9. घटनाओं का क्रम भी संदेह बढ़ाता है-आपकी नियुक्ति के बाद आपके बच्चों को सरकारी पैनल में शामिल किया गया.
10. ये परिस्थितियां कम से कम चिंताजनक हैं.
11. मामले से अलग होने की याचिका खारिज करने वाले निर्णय की भाषा ने भी मेरे विश्वास को और कमजोर किया है. उसमें मेरी याचिका को न्यायाधीश की गरिमा पर हमला बताया गया, जो मेरे तर्कों का उत्तर नहीं है.
12. ऐसे में एक आम नागरिक कैसे विश्वास करे कि यह पीठ निष्पक्ष निर्णय दे सकती है, खासकर जब मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो?
13. यह मामला अब केवल मेरा नहीं रहा, बल्कि देशभर में चर्चा का विषय बन चुका है. यदि लोगों का विश्वास डगमगाता है, तो नुकसान केवल मेरा नहीं बल्कि संस्था का भी है.
14. न्याय का सिद्धांत है-न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए.
15. मैं न्यायपालिका के खिलाफ नहीं हूँ. मुझे इसी न्यायपालिका से राहत मिली है.
16. यह तर्क गलत है कि ऐसी स्थिति में हर जज को हटना पड़ेगा. अतीत में कई न्यायाधीशों ने स्वेच्छा से खुद को मामलों से अलग किया है.
17–18. उदाहरण स्वरूप, कई न्यायाधीशों ने अपने परिजनों के पेशेवर संबंधों के कारण स्थानांतरण या अलग होने का निर्णय लिया है, जिससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता बढ़ी है.
19. वर्तमान मामले में केवल संदेह ही नहीं, बल्कि ठोस परिस्थितियां हैं जो हितों के टकराव की आशंका को गंभीर बनाती हैं.
20. मेरे अंतःकरण की स्थिति यह है कि अब मैं इस प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकता.
21. गांधीवादी सत्याग्रह की भावना से प्रेरित होकर, मैंने निर्णय लिया है कि मैं इस मामले की आगे की कार्यवाही में भाग नहीं लूंगा-न स्वयं, न वकील के माध्यम से. मैं इसके कानूनी परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ.
22. यह निर्णय केवल इस मामले तक सीमित है. अन्य मामलों में, जहां ऐसी परिस्थितियां नहीं होंगी, मैं उपस्थित होता रहूंगा.
23. मुझे मामले से अलग होने के खारिज करने के आदेश को चुनौती देने और सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित है.
24. अंत में, मैं पुनः स्पष्ट करता हूँ कि मेरा विश्वास संविधान और न्यायपालिका में बना हुआ है. मेरी आपत्ति केवल इस विशेष मामले की परिस्थितियों को लेकर है.
25. कृपया इस पत्र को रिकॉर्ड में लिया जाए और न्यायालय आगे जैसा उचित समझे वैसा करे.
