गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने से क्यों बच रही सरकार: अरशद मदनी
देवबंद। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने एक बार फिर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि इससे गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग और हिंसा की घटनाओं पर रोक लग सकती है। सरकार उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने से क्यों बच रही है यह बड़ा सवाल है।
मौलाना अरशद मदनी ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं होगी, बल्कि उन्हें खुशी होगी कि समाज में नफरत और तनाव कम होगा। मदनी ने सवाल उठाया कि जब देश की बहुसंख्यक आबादी गाय को मां का दर्जा देती है, तो सरकार उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने से क्यों बच रही है। उन्होंने कहा कि यह मांग केवल मुस्लिम समाज की नहीं, बल्कि कई साधु-संत भी लंबे समय से उठा रहे हैं।
आरोप लगाया कि गाय के मुद्दे को राजनीतिक और भावनात्मक हथियार बना दिया गया है। गोकशी और पशु तस्करी के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जाता है, जिससे मुसलमानों की छवि खराब हुई है। मौलाना मदनी ने कहा कि पहले बड़ी संख्या में मुसलमान गाय पालन और दुग्ध व्यवसाय से जुड़े थे, लेकिन वर्ष 2014 के बाद बने माहौल के कारण अब अधिकांश लोग भैंस पालना अधिक सुरक्षित समझते हैं। उन्होंने कहा कि जमीयत हमेशा मुसलमानों को दूसरे धर्मों की भावनाओं का सम्मान करने और प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी से बचने की सलाह देती रही है। मौलाना मदनी ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और पशु वध कानूनों में अलग-अलग राज्यों में मौजूद भिन्नता पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि कई राज्यों में खुलेआम गोमांस खाया जाता है, यहां तक कि वहां भाजपा सरकारें भी हैं, लेकिन गाय के नाम पर हिंसा करने वाले लोग वहां खामोश रहते हैं। उन्होंने इसे दोहरा रवैया बताते हुए कहा कि कुछ राज्यों में गाय को राजनीतिक मुद्दा बनाया जाता है, जबकि अन्य जगहों पर उसे मिथुन कहकर अलग नजरिये से देखा जाता है। मौलाना मदनी ने कहा कि गाय के प्रति वास्तविक श्रद्धा से ज्यादा राजनीति को प्राथमिकता दी जा रही है और चुनावों में भावनात्मक मुद्दों के जरिए समाज को बांटने की कोशिश होती है। उन्होंने मांग दोहराई कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देशभर में एक समान कानून लागू किया जाए, ताकि विवाद और भेदभाव समाप्त हो सके।
