लंदन की अदालत में हाई कोर्ट के पूर्व जज की नीरव के पक्ष में गवाही, जानें कौन हैं अभय थिप्से

 

 

  • नीरव मोदी के प्रत्यर्पण से संबंधित सुनवाई में बंबई और इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पूर्व जज ने नीरव के पक्ष में गवाही दी
  • पूर्व अभय थिप्से अब कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं, वह शतरंज के भारतीय ग्रैंडमास्टर प्रवीण महादेव थिप्से के भाई हैं
  • थिप्से 1987 में महाराष्ट्र न्यायिक सेवा में शामिल हुए थे और इसके बाद 2007 में जलगांव में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने

नई दिल्ली
भगोड़े हीरा कोराबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण की लंदन की एक अदालत में चल रही सुनवाई में बंबई और इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पूर्व जज ने नीरव के पक्ष में गवाही दी है। पूर्व अभय थिप्से अब कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। न्यायमूर्ति थिप्से (64) शतरंज के भारतीय ग्रैंडमास्टर प्रवीण महादेव थिप्से के भाई हैं। वह विभिन्न मामलों में अपने उल्लेखनीय फैसलों के लिए चर्चित हैं।

थिप्से 1987 में महाराष्ट्र न्यायिक सेवा में शामिल हुए थे और इसके बाद 2007 में वह जलगांव में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने। मार्च 2011 में वह मुंबई हाई कोर्ट के जज बने और इसके बाद मई 2016 में उनका स्थानांतरण इलाहाबाद हाई कोर्ट में हुआ, जहां से वह 2017 में सेवानिवृत्त हुए।

इन केसों से जुड़े रहे थिप्से
अपने अदालती करियर में कई वर्षों तक न्यायमूर्ति थिप्से ने कई अदालतों और विशेष अदालतों में अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान मई 2015 में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को 2002 में हिट ऐंड रन केस में जमानत देने और उनकी पांच साल कारावास की सजा को निरस्त करने सहित कई बहुचर्चित मामले उन्होंने निपटाए थे।

बता दें कि 2002 में हिट ऐंड रन केस में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को जमानत देने के अलावा भी थिप्से कई हाई प्रोफाइल केसों की सुनवाई कर चुके हैं। नैशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड घोटाले के आरोपी जिग्नेश शाह और गुजरात दंगों से जुड़ा बेस्ट बेकरी केस से भी थिप्से का नाम जुड़ा रहा हैं।

गवाही में ये बोले थिप्से
आपको बता दें कि भगोड़े हीरा कोराबारी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण की लंदन की एक अदालत में चल रही सुनवाई में थिप्से ने नीरव के समर्थन में गवाही दी है। थिप्से ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के जरिए गवाही में लंदन की अदालत को बताया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के नीरव पर लगाए गए आरोप भारतीय कानूनों के तहत नहीं टिक पाएंगे।

थिप्से ने कहा, ‘भारतीय कानून के मुताबिक जब तक कि किसी के साथ धोखा न हो, तब तक धोखाधड़ी नहीं होगी। धोखाधड़ी के अपराध में धोखा अनिवार्य हिस्सा है। अगर LoUs जारी होने से किसी के साथ धोखा नहीं हुआ है तो किसी कॉर्पोरेट बॉडी के साथ धोखाधड़ी का सवाल ही नहीं है। बैंक के अधिकारियों को LoUs जारी करने का जो अधिकार दिया गया है, उसे प्रॉपर्टी नहीं कहा जा सकता और उन्हें संपत्ति के साथ सुपुर्द करने के लिए भी नहीं कहा जा सकता। लिहाजा यह भरोसा तोड़ने वाला अपराध (criminal breach of trust) नहीं हो सकता।’

 
 

Related posts

Top