बच्ची को पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन उसे मां बनाने पर तुले हैं… Rape Victim के Abortion मामले में Supreme Court नाराज

बच्ची को पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन उसे मां बनाने पर तुले हैं… Rape Victim के Abortion मामले में Supreme Court नाराज

कोर्ट ने साफ किया कि ऐसा फ़ैसला पीड़िता और उसके परिवार का होना चाहिए, न कि सरकार का। चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार के इस कदम पर कड़ा एतराज़ जताते हुए कहा, ‘नागरिकों का सम्मान करें, मैडम… आपको इसे चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है… सिर्फ़ पीड़िता या उसका परिवार ही इसे चुनौती दे सकता है।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने भी सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि हम व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करते हैं, और आपको भी करना चाहिए। अदालत ने कहा कि माता-पिता को चिकित्सा संबंधी जानकारी दी जानी चाहिए और उन्हें यह तय करने की अनुमति मिलनी चाहिए कि बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा क्या है।

समय सीमा वाले कानून पर फिर से सोचने की अपील

एक अहम टिप्पणी में कोर्ट ने सुझाव दिया कि मौजूदा कानूनों में बदलाव की ज़रूरत हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि जब रेप की वजह से प्रेग्नेंसी होती है, तो कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए। कानून को लचीला और बदलते समय के साथ तालमेल बिठाने वाला होना चाहिए। सरकारी वकीलों की तरफ़ से सरकार ने दलील दी कि इस स्टेज पर प्रेग्नेंसी खत्म करना रिस्की हो सकता है। सरकार ने सुझाव दिया कि नाबालिग लड़की प्रेग्नेंसी को पूरा होने दे और बच्चे को गोद देने के लिए दे दे। हालाँकि, कोर्ट इस नज़रिए से सहमत नहीं हुआ, और उसने पीड़ित लड़की पर पड़ने वाले इमोशनल और साइकोलॉजिकल असर की तरफ़ इशारा किया।

‘बच्चे को गरिमा के साथ जीने दो’

सुनवाई के दौरान बेंच ने एक ज़ोरदार टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर यह एक बच्चे और भ्रूण के बीच की लड़ाई बन गई है, तो बच्चे को गरिमा के साथ जीने दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी ज़ोर देकर कहा कि टीनएजर लड़की को अपने भविष्य पर ध्यान देना चाहिए, न कि ऐसे सदमे के बाद ज़बरदस्ती माँ बनने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए।

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