RSS विजयादशमी उत्सव: मोहन भागवत बोले- वंदे मातरम् गाने में संकोच नहीं होना चाहिए, AI और OTT को लेकर भी दी बड़ी चेतावनी

RSS विजयादशमी उत्सव: मोहन भागवत बोले- वंदे मातरम् गाने में संकोच नहीं होना चाहिए, AI और OTT को लेकर भी दी बड़ी चेतावनी

नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर मंगलवार (20 अक्टूबर) को नागपुर में विजयादशमी उत्सव का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने राष्ट्र की एकता, सनातन संस्कृति, सामाजिक समरसता, स्वदेशी, तकनीक और युवा पीढ़ी से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् देश का राष्ट्रगीत है और इसे पूरे स्वाभिमान के साथ गाने में किसी को संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए।

समारोह में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने संघ की 100 वर्षों की यात्रा, संगठन शक्ति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में उसकी भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए।

वंदे मातरम् एकता और मातृभूमि के प्रति भक्ति का प्रतीक

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि बंगाल विभाजन के षड्यंत्र को परास्त करने में इस गीत ने महत्वपूर्ण प्रेरणा दी थी। आज भी यह राष्ट्र की एकता और स्वाभिमान का सशक्त प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् को ऊंचे स्वर में और संपूर्ण रूप से गाने में किसी तरह का संकोच नहीं होना चाहिए। यह भारत को मातृभूमि मानकर उसके प्रति व्यक्त की जाने वाली भक्ति का प्रतीक है।

आंदोलन का उद्देश्य समाधान हो, समाज में विभाजन पैदा करना नहीं

देश में होने वाले आंदोलनों पर भागवत ने कहा कि भारत अभी विकास की प्रक्रिया में है और जब तक विकास की यात्रा पूरी नहीं होती, तब तक समस्याएं भी बनी रहेंगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनों का होना स्वाभाविक है, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन या गतिविधि से समाज में आपसी द्वेष, टकराव और विभाजन की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।

बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं पर जताई चिंता

दुनिया के विभिन्न देशों में जारी राजनीतिक अस्थिरता का जिक्र करते हुए संघ प्रमुख ने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की।

उन्होंने इन घटनाओं को कथित रूप से सुनियोजित षड्यंत्रों से जोड़ते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन के नाम पर दुनिया में चल रही गतिविधियों से प्रगतिशील देश भी प्रभावित हो रहे हैं।

AI का अनियंत्रित इस्तेमाल बन सकता है महाविनाश का कारण

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर मोहन भागवत ने कहा कि तकनीकी विकास को रोका नहीं जा सकता और इसके अनेक लाभ भी हैं। हालांकि, तकनीक का उपयोग किस दिशा में और किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह सबसे महत्वपूर्ण है।

उन्होंने चेतावनी दी कि नैतिक अनुशासन और विवेक के बिना AI का इस्तेमाल महाविनाश का कारण बन सकता है।

भागवत ने कहा कि भारत के विश्वगुरु बनने का वास्तविक दायित्व आने वाली पीढ़ी के कंधों पर है। इसलिए युवाओं को केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनमें नैतिकता, विवेक और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी आवश्यक है।

OTT प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण और अनुशासन की जरूरत

सरसंघचालक ने डिजिटल माध्यमों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली जानकारी को कई बार उचित-अनुचित का विचार किए बिना ग्रहण कर लेती है।

उन्होंने कहा कि इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद कई देशों ने कुछ प्रतिबंध और अनुशासन लागू किए हैं। भारत में भी विशेष रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म के संबंध में ऐसी आवश्यकता महसूस की जा रही है। सरकार और प्रशासन को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

युवाओं में बढ़ती नशे की लत गंभीर राष्ट्रीय समस्या

मोहन भागवत ने युवा पीढ़ी में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने इसे गंभीर राष्ट्रीय समस्या बताते हुए कहा कि इसके समाधान के लिए सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे।

उन्होंने अभिभावकों से नई पीढ़ी में सही संस्कार, नैतिक मूल्यों और विवेक का विकास करने की अपील की।

हिंदू समाज को संगठित करना सभी पंथों के सम्मान के खिलाफ नहीं

सामाजिक समरसता पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि संगठित और सामर्थ्यवान हिंदू समाज के निर्माण की बात करना किसी अन्य पंथ के प्रति सम्मान या राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध नहीं है।

उन्होंने कहा कि हिंदू समाज का मूल स्वभाव समावेशी रहा है। संघ का कार्य समाज में भावनात्मक एकता, सद्भावना और सदाचार को मजबूत करना है।

संविधान की प्रस्तावना में लिखे ‘हम भारत के लोग’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि देश की विविधताओं को एक सूत्र में बांधने वाला भावनात्मक बंधन है।

उन्होंने कहा कि भाषा, जाति और पंथ के प्रति स्वाभाविक लगाव हो सकता है, लेकिन राष्ट्र के प्रति निष्ठा और कर्तव्यबोध इन सबसे ऊपर होना चाहिए।

भारत की सनातन दृष्टि में वैश्विक समस्याओं का समाधान

संघ प्रमुख ने कहा कि आज दुनिया विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने तथा विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की चुनौती का सामना कर रही है।

उनके अनुसार, भारत की सनातन परंपरा विविधताओं के सम्मान के साथ संपूर्ण अस्तित्व की एकता का संदेश देती है। पूरी दुनिया को एक परिवार मानने वाली भारतीय दृष्टि वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए संतुलित और स्थायी विकास का रास्ता दिखा सकती है।

उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों और वीर सावरकर के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका राष्ट्र के प्रति समर्पण किसी सौदे या शर्त पर आधारित नहीं था, बल्कि भारत माता के प्रति निस्वार्थ आत्मीयता का भाव था।

संजय गुप्त बोले- संघ ने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीयता को मजबूत किया

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त ने संघ की ऐतिहासिक यात्रा की सराहना की। उन्होंने कहा कि तमाम राजनीतिक विरोध और चुनौतियों के बावजूद संघ व्यक्ति निर्माण, राष्ट्रनिष्ठा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के अपने मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता रहा है।

उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित और सामर्थ्यवान बनाना तथा पराधीनता की मानसिकता से देश को मुक्त करना था।

संजय गुप्त ने भारतीय संस्कृति और हिंदू जीवन पद्धति के संरक्षण में संघ के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि भारतीयता और हिंदुत्व की वैश्विक पहचान को मजबूत बनाने में संगठन की बड़ी भूमिका रही है।

भाजपा की संगठनात्मक सफलता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनसंघ से लेकर वर्तमान भाजपा तक नेताओं में भारतीयता और राष्ट्रीयता के संस्कार विकसित करने में संघ की वैचारिकता और अनुशासन का योगदान रहा है।

उन्होंने संघ और दैनिक जागरण की मूल नीतियों में भारतीय सनातन संस्कृति, सद्भावना और राष्ट्र के प्रति समर्पण को साझा आधार बताया।

पंच परिवर्तन और स्वदेशी पर संघ का जोर

मोहन भागवत ने संघ की शताब्दी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन पिछले 100 वर्षों से भारत के ‘स्व’ को जागृत करने और संगठित समाज के निर्माण के लिए कार्य कर रहा है।

उन्होंने पंच परिवर्तन के मूल में स्वबोध, स्वदेशी आचरण और सांस्कृतिक अस्मिता को महत्वपूर्ण बताया। भागवत ने कहा कि राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक नागरिक में अनुशासन, सामाजिक जिम्मेदारी और कर्तव्य के प्रति सजगता आवश्यक है।

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