मजालिस में वारिदे करबला और तौहीद पर डाली गई रोशनी
सहारनपुर। मोहर्रम की दूसरी तारीख की रात नगर के विभिन्न इमामबाड़ों में आयोजित मजालिस में मुस्लिम धर्मगुरुओं ने वारिदे करबला (करबला में प्रवेश) और तौहीद (एकेश्वरवाद) के विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। मजालिस का आगाज मरसिया खानी से हुआ, जिसमें आसिफ अल्वी, सलीस हैदर काजमी, हमजा जैदी, सलीम आब्दी तथा ख्वाजा रईस अब्बास सहित अन्य लोगों ने मरसिए पेश किए।
पहली मजलिस मोहल्ला कायस्थान स्थित इमामबाड़ा सामानियान में आयोजित हुई, जिसे मौलाना हसन हैदर सादिकी ने संबोधित किया। दूसरी मजलिस बड़ा इमामबाड़ा जाफर नवाज में हुई, जिसमें मौलाना सैय्यद तहकीक हुसैन ने खिताब किया। वहीं तीसरी मजलिस छोटा इमामबाड़ा अंसारियान में आयोजित हुई, जिसे मौलाना जहूर मेहदी मौलाई ने संबोधित किया। वक्ताओं ने करबला के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए बताया कि जब हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का काफिला करबला की ओर बढ़ रहा था, तब यजीद के गवर्नर इब्ने जियाद ने अपने सेनापति हुर्र को उन्हें रोककर करबला लाने के लिए भेजा। हुर्र का लश्कर प्यास से बेहाल था, जिसे देखकर हजरत इमाम हुसैन ने अपने साथियों को उन्हें और उनके घोड़ों को पानी पिलाने का आदेश दिया। बाद में जब करबला में इमाम हुसैन और उनके साथियों पर पानी बंद कर दिया गया तथा मासूम बच्चे प्यास से तड़पने लगे, तब हुर्र को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अपने बेटे और भाई के साथ इमाम हुसैन की सेवा में पहुंचकर क्षमा मांगी, जिसे इमाम हुसैन ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद हुर्र ने यजीद की सेना के विरुद्ध जंग लड़ी और करबला के मैदान में सबसे पहले शहीद होने का गौरव प्राप्त किया।
मजालिस में वक्ताओं ने कहा कि सत्य और न्याय की राह पर चलने वालों को कभी भयभीत नहीं होना चाहिए। हक हमेशा बातिल पर विजय प्राप्त करता है और सत्य की ताकत संख्या पर नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों पर निर्भर करती है। मजलिसों के समापन पर अंजुमन अकबरिया, अंजुमन इमामिया तथा अंजुमन सोगवारे अकबरिया के सदस्यों ने नौहाखानी और सीनाजनी कर हजरत इमाम हुसैन एवं शहीदाने करबला को श्रद्धांजलि अर्पित की।
