जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्राकृतिक खेती और आधुनिक तकनीक अपनाना जरूरी: कुलपति

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्राकृतिक खेती और आधुनिक तकनीक अपनाना जरूरी: कुलपति
मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय में जलवायु परिवर्तन, सूखा प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों पर आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में उपस्थित कुलपति एवं विशेषज्ञ।

मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय में राज्य स्तरीय कार्यशाला आयोजित, सूखा प्रबंधन, जल संरक्षण और एआई आधारित कृषि तकनीकों पर हुआ मंथन

सहारनपुर। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच कृषि क्षेत्र को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और आधुनिक तकनीकों को अपनाना जरूरी है। इसके लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रभावी आपदा प्रबंधन और पारंपरिक कृषि ज्ञान के साथ नई तकनीकों का समन्वय करना होगा। यह बात मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. विमला वाई. ने गुरुवार को आयोजित राज्य स्तरीय कार्यशाला में कही।

मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय में उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रायोजन में ‘जलवायु समुत्थानशीलता, सूखा न्यूनीकरण एवं प्रौद्योगिकी आधारित कृषि पद्धतियां’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों, सूखा प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग पर विचार साझा किए। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया।

फसल चक्र, मृदा परीक्षण और जल संरक्षण पर जोर

कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. विमला वाई. ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए कृषि पद्धतियों में जरूरी बदलाव करना समय की मांग है। किसानों को फसल चक्र, मिश्रित खेती, मृदा परीक्षण, जल संरक्षण और वृक्षारोपण जैसी विधियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कृषि क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सहित आधुनिक तकनीकों के विवेकपूर्ण उपयोग पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक कृषि ज्ञान और वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वय खेती को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के साथ उसकी उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने में भी सहायक हो सकता है।

पद्मश्री किसान सेठपाल सिंह ने साझा किए अनुभव

कार्यशाला में पद्मश्री से सम्मानित प्रगतिशील किसान सेठपाल सिंह ने प्राकृतिक एवं संतुलित खेती, मृदा स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण खाद्य उत्पादन के महत्व पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कृषि को टिकाऊ बनाने के लिए प्रकृति के अनुकूल खेती की पद्धतियों पर विचार रखे।

इस अवसर पर प्रो. दिनेश कुमार, डॉ. मुर्तजा हसन, डॉ. मनोज सिंह और डॉ. रविंद्र तोमर सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने सूखे की स्थिति से निपटने, उपलब्ध जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रभावी इस्तेमाल की आवश्यकता बताई।

विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों के सवालों के दिए जवाब

कार्यशाला के दौरान सूखा न्यूनीकरण, जल प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और तकनीक आधारित कृषि पद्धतियों के व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। कुलपति प्रो. विमला वाई. ने डॉ. मनोज सिंह को सम्मानित किया। डॉ. पंकज कुमार ने कार्यशाला के उद्देश्य और महत्व की जानकारी दी।

तकनीकी सत्र के बाद विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों के सवालों के जवाब दिए और कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान पर चर्चा की।

कार्यक्रम में कुलसचिव कमल कृष्ण, उपकुलसचिव अनूप कुमार, संजीव कुमार, प्रो. विनोद कुमार, डॉ. राजीव कौशिक, डॉ. आर.के. गुप्ता, डॉ. राजकुमार, डॉ. सुदर्शना मिश्रा, डॉ. सुरेंद्र कुमार, डॉ. संदीप कुमार तथा विश्वविद्यालय के सीईओ अभिनव पुंडीर सहित अनेक शिक्षक, अधिकारी और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

Leave a Reply