SIR पर पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का बड़ा बयान, बोले- ‘EC की छवि हो रही खराब’
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर उठाए सवाल, बोले- प्रक्रिया को लेकर लोगों की परेशानी और बढ़ी
नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। 24 सितंबर को एबीपी न्यूज से बातचीत में लवासा ने कहा कि उन्हें इस बात का दुख है कि इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था की छवि इस तरह प्रभावित हो रही है। उन्होंने SIR की प्रक्रिया से लोगों को हुई परेशानी और चुनाव आयोग के भीतर उठ रही चिंताओं का भी जिक्र किया।
लवासा की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब SIR, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम को लेकर कई सवाल सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं। इससे पहले लवासा ने SIR की प्रक्रिया की निष्पक्षता और इसके तहत मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव को लेकर भी सवाल उठाए थे।
‘SIR का कोई मतलब नहीं’
लवासा ने SIR को लेकर अपनी असहमति जाहिर करते हुए कहा कि प्रक्रिया को लेकर जिस तरह की परिस्थितियां सामने आ रही हैं, उनसे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। उनके मुताबिक, मतदाता सूची को दुरुस्त करना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे पात्र मतदाता अपने मतदान के अधिकार से वंचित न हों।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग जैसी संस्था के लिए लोगों का विश्वास बेहद महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, मौजूदा विवादों से इस भरोसे पर असर पड़ने की चिंता स्वाभाविक है।
SIR की कानूनी प्रक्रिया पर भी सवाल
इससे एक दिन पहले लवासा ने SIR के दौरान फॉर्म-6 और ERO-Net सिस्टम में किए गए बदलावों की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उन्होंने चुनाव आयोग से स्पष्ट करने को कहा कि क्या इन बदलावों के लिए आवश्यक प्रक्रिया और मंजूरी का पालन किया गया था।
लवासा ने एक गोवा मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें 97 मतदाताओं की पात्रता की जांच के बाद उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने में सिस्टम से जुड़ी समस्या की बात सामने आई थी। उन्होंने कहा कि यदि स्थानीय स्तर पर कानूनी अधिकार रखने वाला निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल नहीं कर पा रहा है, तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करता है।
‘कानूनी होना और निष्पक्ष होना अलग बात’
लवासा इससे पहले भी SIR को लेकर कह चुके हैं कि किसी प्रक्रिया का कानूनी होना और उसका निष्पक्ष होना अलग-अलग सवाल हैं। सितंबर की शुरुआत में उन्होंने SIR को लाखों लोगों पर लागू होने वाली ऐसी प्रक्रिया बताया था, जिसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि मतदाता सूची से नाम हटने की स्थिति में लोगों के सामने अपने अधिकार साबित करने की मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
SIR को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सहित दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं। आयोग ने अलग-अलग स्तर पर हुई चर्चाओं या राय में अंतर को औपचारिक संस्थागत असहमति मानने से इनकार किया है।
वहीं, लवासा ने कहा है कि पूरे रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के बीच हुई बातचीत की जानकारी सामने आने के बाद ही इस विवाद की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकती है। उन्होंने चुनाव आयोग में जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।
SIR को लेकर बहस हुई तेज
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी अलग-अलग पहलुओं पर सुनवाई हुई है। दिल्ली में SIR के दौरान भेजे गए कुछ नोटिसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर को चिंता जताई और मतदाताओं को जवाब देने के लिए WhatsApp और ईमेल जैसे माध्यमों का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया।
ऐसे में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की ताजा टिप्पणी ने SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रही बहस को और प्रमुख बना दिया है। अब नजर इस बात पर है कि चुनाव आयोग इन उठाए गए सवालों पर आगे क्या स्पष्टीकरण देता है।
