5वीं पास छात्रा नहीं पढ़ सकी हिंदी अखबार, इलाहाबाद हाईकोर्ट हैरान; UP की शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा जिले से जुड़े एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था और पॉक्सो कानून के व्यावहारिक प्रभावों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. कोर्ट उस समय हैरान रह गया, जब पांचवीं कक्षा तक पढ़ी एक युवती न तो हिंदी अखबार पढ़ सकी और न ही अपने नाम के अलावा कुछ लिख पाई. इस पर अदालत ने शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य बच्चों को कक्षा 12 तक शिक्षा से जोड़े रखने में आखिर क्यों असफल रहा.
जब पांचवीं की छात्रा अखबार तक नहीं पढ़ सकी
यह मामला बांदा जिले से जुड़ी एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का है. सुनवाई के दौरान कथित नाबालिग लड़की को इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने पेश किया गया. मामले की सुनवाई जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ कर रही थी.
इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बेहद चिंताजनक और हैरान करने वाली स्थिति है.
शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर अदालत की चिंता
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि राज्य की शिक्षा व्यवस्था का संक्षिप्त मूल्यांकन किया जाए तो उसकी गुणवत्ता गंभीर चिंता का विषय दिखाई देती है. अदालत ने सवाल उठाया कि लड़की की पढ़ाई केवल पांचवीं तक ही क्यों सीमित रह गई. कोर्ट ने पूछा कि राज्य उसे 12वीं तक विद्यालय में बनाए रखने और शिक्षा जारी रखने में असमर्थ क्यों रहा. अदालत ने कहा कि बच्चों को बालिग होने तक शिक्षा और कौशल विकास से जोड़ना राज्य की जिम्मेदारी है ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.
पॉक्सो कानून पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के कठोर प्रावधानों और भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं के बीच मौजूद अंतर पर भी चर्चा की. कोर्ट ने कहा कि भारत की बड़ी आबादी आज भी अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित है. ऐसे लोगों को कई बार संविधान, कानून और उनके कानूनी परिणामों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती.
पीठ ने कहा कि लगभग 15 वर्ष की आयु में शारीरिक और भावनात्मक परिपक्वता के साथ आकर्षण पैदा होना एक स्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया है. ऐसे में कानूनी परिणामों को समझने की अपेक्षा करने से पहले राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को पर्याप्त शिक्षा मिले.
क्या था पूरा मामला?
मामला एक युवक और युवती से जुड़ा है, जो वर्ष 2025 में घर से चले गए थे. बाद में दोनों ने एक संयुक्त हलफनामा देकर खुद को पति-पत्नी बताया था. इस दौरान युवती ने एक बच्चे को जन्म भी दिया. लड़की के पिता और राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि घटना के समय युवती नाबालिग थी. पिता ने यह भी दावा किया कि दोनों सपिंड संबंध में आते हैं, इसलिए विवाह वैध नहीं माना जा सकता. युवती को पहले बाल गृह भेजा गया था, जहां उसने बच्चे को जन्म दिया. सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि बच्चा दो महीने से अधिक उम्र का है और याचिकाकर्ता युवक ही उसका पिता है.
पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर
अदालत ने युवती के 45 वर्षीय पिता से भी बातचीत की. उन्होंने बताया कि वह पूरी तरह अनपढ़ हैं और मजदूरी करके महीने में 10 से 12 हजार रुपये कमाते हैं. परिवार में चार बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता हैं तथा वे ही अकेले कमाने वाले सदस्य हैं.
लॉ कमीशन से संशोधन पर विचार करने का आग्रह
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विधि आयोग (लॉ कमीशन) से अनुरोध किया कि वह भारतीय सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पॉक्सो कानून में आवश्यक संशोधनों पर विचार करे. कोर्ट ने सुझाव दिया कि विशेष परिस्थितियों वाले मामलों में न्यायाधीशों को सजा तय करने का अधिक विवेकाधिकार दिया जा सकता है. अदालत ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंड पर विचार किया जा सकता है.
ऑसिफिकेशन टेस्ट के आधार पर माना बालिग
उम्र निर्धारण को लेकर अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर न तो जन्म प्रमाण पत्र था और न ही मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र. केवल कक्षा पांच का ट्रांसफर सर्टिफिकेट उपलब्ध था. ऐसी स्थिति में कराए गए ऑसिफिकेशन टेस्ट में युवती की उम्र करीब 18 वर्ष आंकी गई. इसके आधार पर अदालत ने उसे बालिग मानते हुए उसकी इच्छा और सहमति के अनुसार अपने पति के साथ जाने की अनुमति दे दी.
