सलमान खुर्शीद ने बाबरी विध्वंस पर की टिप्पणी, बोले- रणनीतिक संयम के फैसलों पर बाद में उठते हैं सवाल
नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि सरकारें कई बार ऐसे निर्णय लेती हैं जिन्हें उस समय “रणनीतिक संयम” के तौर पर देखा जाता है, लेकिन समय बीतने के बाद उन्हीं फैसलों पर सवाल भी खड़े हो सकते हैं। उन्होंने बाबरी विध्वंस की घटना को देश के इतिहास का बेहद दर्दनाक अध्याय बताते हुए कहा कि किसी एक घटना को अलग नजरिए से देखने पर उसका प्रभाव बहुत बड़ा और गंभीर दिखाई देता है।
सलमान खुर्शीद नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जहां वकील और लेखक जावेद गाया की पुस्तक “हार्टलैंड राइजिंग: द मेकिंग ऑफ मेजॉरिटेरियन इंडिया” का विमोचन किया गया। इस दौरान उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस, 2002 के गुजरात दंगे, देश के विभाजन और उत्तर प्रदेश की राजनीति समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी राय रखी।
बाबरी विध्वंस पर क्या बोले खुर्शीद?
कार्यक्रम की संचालक मालविका राजकोटिया ने उनसे पूछा कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने कथित तौर पर रणनीतिक संयम क्यों अपनाया था। इसके जवाब में खुर्शीद ने कहा कि इतिहास की घटनाओं का आकलन बाद में करना आसान होता है, लेकिन उस समय परिस्थितियां अलग होती हैं और सरकारों को उपलब्ध विकल्पों के आधार पर निर्णय लेने पड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि उस दौर में कुछ लोगों का मानना था कि संयम बरतना ही बेहतर विकल्प था, क्योंकि कठोर कदम उठाने से हालात और ज्यादा बिगड़ सकते थे। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि बाद में यह तर्क दिया जा सकता है कि वही संयम कुछ परिस्थितियों को और गंभीर बनाने का कारण बना।
विभाजन का भी किया जिक्र
देश के विभाजन के मुद्दे पर बोलते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि आज भी कुछ लोग पंडित जवाहरलाल नेहरू को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। उन्होंने कहा कि यह सवाल उठाया जा सकता है कि विभाजन को स्वीकार क्यों किया गया, लेकिन उस समय के नेताओं के सामने परिस्थितियां बेहद जटिल थीं और उन्हें उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ निर्णय लेना पड़ा।
खुर्शीद ने कहा कि इतिहास की घटनाओं पर वर्षों बाद टिप्पणी करना अपेक्षाकृत आसान होता है, जबकि सत्ता में रहते हुए निर्णय लेना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है।
उत्तर प्रदेश को बताया राजनीतिक बदलाव का केंद्र
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर चर्चा करते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि देश के लोकतांत्रिक और राजनीतिक भविष्य में उत्तर प्रदेश की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यदि भारत को संस्थापकों की लोकतांत्रिक सोच के अनुरूप आगे बढ़ना है तो उसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो सकती है।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक बदलाव को लेकर अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग मानते हैं कि परिवर्तन संभव नहीं है, जबकि अन्य का विश्वास है कि बदलाव की शुरुआत उत्तर प्रदेश से होगी। वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह परिवर्तन भाजपा के भीतर से आ सकता है, जबकि अन्य गठबंधन राजनीति को इसकी संभावित राह मानते हैं।
