सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई से गरमाई सियासत, अरशद मदनी ने उठाए कानून के समान इस्तेमाल पर सवाल
सहारनपुर। कलेक्ट्रेट परिसर के अंदर बनी मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। इस मामले में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और दारुल उलूम देवबंद के प्रिंसिपल मौलाना अरशद मदनी ने गहरा दुख जताते हुए प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे बेहद अफसोसजनक बताते हुए कहा कि मामला सिर्फ एक धार्मिक स्थल को हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिकों की समानता और कानून के शासन से जुड़े गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
‘कानून लागू करने में अलग-अलग मापदंड क्यों?’
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अगर संविधान देश के सभी नागरिकों और धर्मों को समान अधिकार देता है, तो कानून लागू करने में अलग-अलग मापदंड क्यों नजर आते हैं। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद को सुबह करीब पांच बजे ध्वस्त किया गया।
मदनी के मुताबिक, किसी धार्मिक स्थल से जुड़े विवाद में प्रशासन को कार्रवाई से पहले उसके ऐतिहासिक रिकॉर्ड, धार्मिक उपयोग और कानूनी स्थिति की गंभीरता से जांच करनी चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि मस्जिद का वक्फ बोर्ड में पंजीकरण है और इसका पंजीकरण नंबर 451 बताया गया है। साथ ही उन्होंने मस्जिद की जमीन के स्वामित्व और उससे जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों की उचित कानूनी जांच की जरूरत बताई।
पूजा स्थल अधिनियम का भी दिया हवाला
अरशद मदनी ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में कानून की भावना और उसके प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए। उन्होंने वक्फ से जुड़े कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए मस्जिद के लंबे समय से धार्मिक उपयोग और उपलब्ध रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखने की बात कही।
‘अगर अतिक्रमण हटाना है तो नियम सब पर समान हों’
मौलाना मदनी ने सवाल किया कि अगर प्रशासन की कार्रवाई का आधार अवैध कब्जा या अतिक्रमण हटाना है, तो यही नियम हर धर्म और हर समुदाय के धार्मिक स्थलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी या सार्वजनिक जमीन पर वर्षों से धार्मिक निर्माण मौजूद हैं। ऐसे में किसी एक मामले में तेजी और सख्ती से कार्रवाई होने पर निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मस्जिद कमेटी ने अदालत में रखे थे पुराने रिकॉर्ड
मदनी ने कहा कि मस्जिद कमेटी की ओर से अदालत में ऐतिहासिक दस्तावेज और पुराने रिकॉर्ड पेश किए गए थे। कमेटी का दावा है कि मस्जिद कलेक्ट्रेट की मौजूदा इमारत से भी पहले से मौजूद थी। इसके समर्थन में पुराने नगरपालिका और राजस्व रिकॉर्ड समेत अन्य दस्तावेज अदालत के सामने रखे जाने की बात कही गई थी।
‘कानूनी और ऐतिहासिक पहलुओं की पूरी जांच जरूरी’
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अगर किसी स्थान पर लंबे समय से नमाज अदा की जा रही हो और कई पीढ़ियों से लोग उसे मस्जिद के रूप में इस्तेमाल करते रहे हों, तो उसके ऐतिहासिक और कानूनी पहलुओं की पूरी जांच जरूरी है।
उन्होंने कहा कि भारत सभी धर्मों और समुदायों का साझा देश है और संविधान किसी नागरिक के साथ उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि सरकार से किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं की जा रही, बल्कि सभी नागरिकों और धार्मिक स्थलों के लिए कानून के समान रूप से लागू होने की मांग की जा रही है।
मदनी ने सरकार और प्रशासन से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि कानून का इस्तेमाल किसी समुदाय के प्रति भेदभावपूर्ण या अलग रवैये के रूप में दिखाई न दे। उन्होंने कहा कि संविधान और कानून की वास्तविक ताकत तभी साबित होगी, जब उनका संरक्षण और पालन हर नागरिक के लिए समान रूप से सुनिश्चित किया जाए।
