गणपति पूजन आत्म तत्व शोध एवं जागृति का महान आधार: कालेंद्रानंद

गणपति पूजन आत्म तत्व शोध एवं जागृति का महान आधार: कालेंद्रानंद
सहारनपुर में श्रीगणेश स्थापना के अवसर पर पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु।

महा शक्तिपीठ वैष्णवी महाकाली मंदिर में विधि-विधान से हुई गणेश स्थापना, श्रद्धालुओं ने की सुख-समृद्धि की कामना

सहारनपुर। राधा विहार स्थित महा शक्तिपीठ वैष्णवी महाकाली मंदिर में गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर गणेश महोत्सव का विधिवत शुभारंभ हुआ। श्री रामकृष्ण विवेकानंद संस्थान के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भगवान श्रीगणेश की पूजा-अर्चना की। इस दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा और श्रद्धालुओं ने गणपति महाराज से सुख, समृद्धि एवं परिवार के कल्याण की कामना की।

गणेश स्थापना के अवसर पर अष्टधातु निर्मित भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा को विधि-विधान के साथ गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और गुलाब जल से स्नान कराया गया। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान गणेश की विधिवत स्थापना की गई। पूजा-अर्चना के उपरांत गणपति महाराज को भोग अर्पित किया गया और श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से आरती कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

रिद्धि-सिद्धि, बुद्धि और समृद्धि के दाता हैं गणपति

इस अवसर पर स्वामी कालेंद्रानंद महाराज ने गणपति की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान गणेश को रिद्धि, सिद्धि, बुद्धि और समृद्धि का दाता माना गया है। गणपति महाराज को साक्षात ब्रह्म का आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि सभी देव शक्तियों का ऊर्जा तत्व गणेश जी में समाहित माना गया है।

उन्होंने कहा कि गणपति पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्म तत्व के शोध और जागृति का महान आधार है। गणेश जी की आराधना मनुष्य को ज्ञान, विवेक और सकारात्मक ऊर्जा की ओर ले जाने का माध्यम बनती है।

व्यास और गणपति से जुड़ा प्रसंग सुनाया

स्वामी कालेंद्रानंद महाराज ने गणेश जी से जुड़े पौराणिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि शास्त्रीय मान्यता के अनुसार बदरी वन के माणा गांव में व्यास जी महाराज महाभारत की रचना के लिए अपने मुख से उसका व्याख्यान कर रहे थे और भगवान गणपति उसे लिपिबद्ध करने के साथ-साथ आत्मसात भी कर रहे थे।

उन्होंने बताया कि लगातार महाभारत का श्रवण और लेखन करते रहने के कारण गणपति जी के शरीर का ताप बढ़ता चला गया। इससे व्यास जी चिंतित हुए। मान्यता के अनुसार आकाशवाणी के निर्देश पर व्यास जी ने गणपति जी को सामने प्रवाहित सरस्वती नदी में स्नान कराया। जब उनका ब्रह्म तेज शांत हुआ, तब उन्हें गणेश गुफा में स्थापित किया गया। स्वामी जी ने कहा कि इसी परंपरा से गणेश स्थापना और पूजन की परंपरा को जोड़कर देखा जाता है।

‘गणेश जी का विसर्जन नहीं, ब्रह्म तेज का विसर्जन’

स्वामी कालेंद्रानंद महाराज ने कहा कि शास्त्रीय दृष्टि से गणपति जी का विसर्जन करने के बजाय उनके बढ़े हुए ब्रह्म तेज के विसर्जन की अवधारणा को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान गणेश को मां भगवती पार्वती के ब्रह्म तेज से प्रकट माना गया है। इसी कारण गणपति को प्रकृति के विभिन्न गुणों के समन्वित स्वरूप के रूप में भी देखा जाता है।

उन्होंने कहा कि गणपति महाराज की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और मनुष्य के जीवन में ज्ञान, विवेक एवं सकारात्मकता का संचार होता है। भगवान गणेश प्रथम पूज्य देव हैं और किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी आराधना किए जाने की परंपरा सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की। मंदिर परिसर में पूरे समय भक्तिमय वातावरण बना रहा।

इस अवसर पर रमेश शर्मा, राजेंद्र धीमान, अश्विनी कांबोज, सागर गुप्ता, अनिल कश्यप, राजबाला, बबीता, सुचेता, कमल, चंपा, रानी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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