काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष राम मंदिर चंदा चोरी पर बोले- ‘नौकरशाह नहीं, विद्वानों के हाथ में हो मंदिरों का संचालन’
वाराणसी। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष और काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चंदा चोरी के मामले पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि चोरी की गई धनराशि की रिकवरी होनी चाहिए और सभी मंदिरों, जैसे श्रीराम मंदिर, श्रीकाशी विश्वनाथ, केदारनाथ, महाकाल, सिद्धिविनायक आदि में पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए। इसके तहत चढ़ावे और दान में मिली धनराशि और आभूषण का विवरण वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
आचार्य द्विवेदी ने यह भी सुझाव दिया कि मंदिरों का संचालन ऐसे विद्वानों के हाथ में होना चाहिए, जो धार्मिक परंपराओं की गहरी समझ रखते हों। उन्होंने कहा कि किसी भी नौकरशाह को मंदिर का सीईओ या न्यास का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके बजाय, विद्वानों को इस जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए। उन्होंने सेवादारों को अनुबंध पर रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
आचार्य द्विवेदी ने मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले 40 वर्षों में शंकराचार्य को ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया है, लेकिन वे दो बार भी बैठकों में शामिल नहीं हुए। उनका मानना है कि केवल नाममात्र की सदस्यता देने के बजाय ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, जो सक्रिय रूप से मंदिर के विकास में योगदान दे सकें।
श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए जाने वाले बहुमूल्य सामानों के संरक्षण के लिए उन्होंने एक संग्रहालय स्थापित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि भगवान को चढ़ाए जाने वाले स्वर्ण, रजत और अन्य ऐतिहासिक वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है। इसके साथ ही, उन्होंने सोना-चांदी को गलाने की परंपरा को समाप्त करने की वकालत की, ताकि श्रद्धालुओं के उपहारों को धरोहर के रूप में संरक्षित किया जा सके। नकद चढ़ावे और प्रसाद वितरण की व्यवस्था को भी पूरी तरह पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है, जिससे श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत हो सके।
आचार्य द्विवेदी ने मंदिर कर्मचारियों की नियुक्ति व्यवस्था में बदलाव का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया जाना चाहिए और उनके कार्यों की समीक्षा वर्ष में कम से कम एक बार अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। इसके अलावा, मंदिर के सेवादारों के लिए पारंपरिक वेशभूषा, जैसे धोती-कुर्ता, अनिवार्य करने की भी उन्होंने पैरवी की।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि संघ अपने मूल मार्ग से भटक गया है। उनका आरोप था कि कथावाचकों और महामंडलेश्वरों को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति ने धार्मिक परंपराओं के स्वरूप को बदल दिया है। उन्होंने कहा कि आज धर्म धीरे-धीरे एक “इवेंट” का रूप लेता जा रहा है, जबकि वास्तविक धर्म आस्था, साधना और परंपराओं के संरक्षण से जुड़ा है।
आचार्य द्विवेदी ने तीर्थ और पर्यटन के बीच स्पष्ट अंतर को रेखांकित किया। उनके अनुसार, तीर्थ श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक अनुभव का केंद्र होता है, जबकि पर्यटन केवल भ्रमण का माध्यम है। इसलिए धार्मिक स्थलों के विकास की योजनाओं में उनकी आध्यात्मिक गरिमा और परंपराओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
