अध्यात्म शिक्षा का मूल हैः शिवयोगी

 
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  • शिक्षा का उच्च स्वरूप अध्यात्म हैः महामण्डलेश्वर
  • शि़क्षा में अध्यात्म विषय पर विशेष परिचर्चा का आयोजन
  • अध्यात्म और शिक्षा दोनों एक-दूसरे के पूरक

गंगोह – सहारनपुर। शोभित विश्वविद्यालय, गंगोह के अध्यात्म अध्ययन केंद्र के द्वारा शिक्षा में अध्यात्म विषय पर फेसबुक लाईव आनलाईन परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में शिक्षा में अध्यात्म विषय पर महामण्डलेश्वर मार्तण्डपुरी और हरिद्वार से शिवयोगी रघुवंश पुरी ने विस्तार से विचार रखे। परिचर्चा में माना गया कि शिक्षा के मूल में अध्यात्म आवश्यक है। अध्यात्म किसी धर्म विशेष की पद्धति नहीं अपितु जीवन को सरल, सहज और चरित्रवान बनाने की एक प्रक्रिया है।

शोभित विश्वविद्यालय के अध्यात्म अध्ययन केंद्र की शैक्षिक श्रृंखला के अंतर्गत अध्यात्म में शिक्षा विषय पर विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें महामंडलेश्वर मार्तण्डपुरी और शिवयोगी रघुवंश पुरी ने विभिन्न प्रश्नों का उत्तर देते हुए शिक्षा के साथ अध्यात्म की महत्ता पर विचार रखे। शिक्षा क्या है इस प्रश्न का उत्तर देते हुए शिवयोगी रघुवंश पुरी ने कहा कि जीवन का अनुशासन ही शिक्षा है। परम्परा से प्राप्त ज्ञान जो परम लक्ष्य की ओर ले जाए वह शिक्षा है। दुर्भाग्य से आज हम अविद्या को ही विद्या मान बैठे हैं।

ज्ञान-विज्ञान की आवश्यकता पर आए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातन संस्कृति में धर्म के साथ-साथ आयुर्वेद, आयुध, संगीत, नृत्य सभी गुणों का भी विकास किया जाता था। वास्तव में अध्यात्म शिक्षा का मूल है। आत्मगुणों का विकास करना, दया, ममता, सहयोग, स्वचिंतन और आत्म अनुशासन ही अध्यात्म है। अध्यात्म और धर्म दोनों भिन्न-भिन्न हैं। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी का आचरण की सीख के लिए गुरूजनों को अधिक सजग होने की आवश्यकता है। गुरूजन जैसा विद्यार्थियों को बनाना चाहते हैं, पहले उन्हें स्वयं वैसा बनना होगा। शिक्षक आचरणशील होगा तो विद्यार्थी आचरणशील स्वतः ही हो जाएगा। जब विद्यार्थी आचरणशील होगा तो निश्चित ही उत्तम समाज का निर्माण हो जाएगा।

महामंडलेश्वर मार्तण्डपुरी ने कहा कि जीवन में शाश्वत मूल्यों का होना बेहद आवश्यक है। बचपन से ही बच्चों में सेवा-भाव का पौधा रोपित किए जाने की महती आवश्यकता है। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति के भीतर पशु, मानव और देवता का निवास है, उस की वृत्तियों पर जो हावी हो जाता है, व्यक्ति वैसा ही बन जाता है। हमें अपने दुखों से बाहर निकल कर संसार के दुखों को देखना होगा। यही अध्यात्म है। इस अध्यात्म के बूते शिक्षा से पशु को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उच्च स्वरूप अध्यात्म है।

 

 
 
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