भारतीय ज्ञान परंपरा से वैश्विक संकटों के समाधान पर मंथन

भारतीय ज्ञान परंपरा से वैश्विक संकटों के समाधान पर मंथन
मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के समापन अवसर पर पुरस्कृत प्रतिभागी।

नैतिक मूल्यों, मानवीय संवेदना और आधुनिक तकनीक के संतुलित समन्वय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन

सहारनपुर। मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन वैश्विक संकट : नैतिक मूल्यों के आधार पर समाधान की संभावनाएं’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का शनिवार को गरिमापूर्ण समापन हुआ। 18 और 19 सितंबर को आयोजित सेमिनार में देशभर से आए विद्वानों और शोधार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता के साथ-साथ वर्तमान वैश्विक, सामाजिक, नैतिक और तकनीकी चुनौतियों के समाधान की संभावनाओं पर व्यापक मंथन किया।

सेमिनार का आयोजन मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय के लोक प्रशासन विद्यालय, राजनीति विज्ञान विद्यालय तथा लंढौरा, हरिद्वार स्थित चमन लाल महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। आयोजन को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली का भी प्रायोजन प्राप्त रहा।

समापन समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. विमला वाई. ने की। मुख्य अतिथि भारतीय राजनीति विज्ञान संघ के महासचिव एवं कोषाध्यक्ष तथा महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के पूर्व कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. ममता सिंह उपस्थित रहीं। इस अवसर पर प्रो. ममता सिंघल, प्रो. विनोद कुमार और विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी सूरज कुमार सहित अनेक शिक्षक एवं शोधार्थी मौजूद रहे।

भारतीय चिंतन की वर्तमान उपयोगिता पर जोर

मुख्य अतिथि प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वर्तमान समय में उपयोगिता और नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की आवश्यकता पर विचार रखे। उन्होंने ज्ञान और समाज के बीच संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान दौर की जटिल चुनौतियों के बीच भारतीय चिंतन की प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार किया जाना आवश्यक है।

कुलपति प्रो. विमला वाई. ने सेमिनार के सफल आयोजन के लिए विद्वानों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों और आयोजन टीम को बधाई दी। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, शोध और सामाजिक जीवन से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

धर्म, न्याय और नैतिक उत्तरदायित्व पर चर्चा

सेमिनार के तकनीकी सत्र में धर्म और आपराधिक न्याय व्यवस्था के संबंध पर भी विस्तार से चर्चा हुई। भारतीय दार्शनिक परंपरा में धर्म, न्याय, कर्तव्य और नैतिक उत्तरदायित्व से जुड़े विचारों की वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

दूसरे दिन के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. ममता सिंघल ने की, जबकि डॉ. पी.के. वर्ष्णेय मुख्य वक्ता रहे। सत्र में मानवीय मूल्य, सामाजिक उत्तरदायित्व, आध्यात्मिक चिंतन, मानव सुरक्षा और वैश्विक चुनौतियों समेत विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने के बजाय उसके नैतिक, मानवीय और संतुलित जीवन-दृष्टिकोण को वर्तमान सामाजिक, तकनीकी और वैश्विक चुनौतियों पर विचार करने के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए।

चार वर्षीय अरविका के संस्कृत श्लोक ने मोहा मन

समापन समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इस दौरान मात्र चार वर्षीय अरविका सिंह ने मंच पर संस्कृत श्लोकों का सुंदर पाठ कर उपस्थित लोगों का मन मोह लिया। आत्मविश्वासपूर्ण प्रस्तुति समारोह के प्रमुख आकर्षणों में रही। उनकी प्रस्तुति के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश भी दिया गया।

आयोजन टीम ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

सेमिनार के संयोजक डॉ. विजय प्रताप सिंह ने अकादमिक दिशा, विषयगत समन्वय और आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन सचिव डॉ. निशु कुमार ने व्यवस्थाओं और समन्वय का दायित्व संभाला। आयोजन टीम में सुश्री पारुल, सुश्री वर्षा, श्रीमती पूजा, डॉ. अंकिता और डॉ. प्रतिभा का भी सक्रिय योगदान रहा।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अपूर्वा ने किया, जबकि दो दिनों के अकादमिक विमर्श, शोध-पत्र प्रस्तुतियों और तकनीकी सत्रों का समेकित प्रतिवेदन डॉ. मितिका ने प्रस्तुत किया।

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों, मानवीय संवेदना और समकालीन चुनौतियों के बीच सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने के संदेश के साथ हुआ।

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