49 साल पुराने हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, उम्रकैद काट चुके आरोपी समेत तीनों बरी; हाई कोर्ट के निर्णय पर उठाए सवाल

49 साल पुराने हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, उम्रकैद काट चुके आरोपी समेत तीनों बरी; हाई कोर्ट के निर्णय पर उठाए सवाल

नई दिल्ली: करीब 49 साल पुराने हत्या के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। अदालत ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और संदिग्ध गवाहियों के आधार पर दोषसिद्धि कर दी।

यह मामला उत्तर प्रदेश में वर्ष 1977 में हुई हत्या से जुड़ा है। इस फैसले की खास बात यह रही कि बरी किए गए आरोपियों में शामिल हीरा लाल पहले ही उम्रकैद की सजा काट चुके हैं। वहीं, दो अन्य आरोपी अपील लंबित रहने के दौरान ही निधन हो चुका है।

उम्रकैद काटने के बाद मिली राहत

हीरा लाल शुरुआत से ही खुद को निर्दोष बताते रहे। ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दो अन्य आरोपियों को जमानत दे दी थी, लेकिन हीरा लाल की जमानत याचिका खारिज हो गई थी और उन्हें जेल में ही रहना पड़ा। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सजा में राहत दिए जाने के बाद वह जेल से बाहर आए।

चश्मदीद गवाहों की गवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने जताया संदेह

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष के मामले में कई गंभीर खामियां थीं। अदालत ने कथित प्रत्यक्षदर्शी (चश्मदीद) गवाहों की गवाही को भरोसेमंद मानने से इनकार करते हुए कहा कि बचाव पक्ष की दलीलों को केवल कल्पना या अटकल बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।

‘घटना का अभियोजन पक्ष का संस्करण साबित नहीं हुआ’

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि 28 जून 1977 को घटना उसी प्रकार हुई थी, जैसा कथित चश्मदीद गवाहों ने बताया। ऐसे में घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी भी संदिग्ध और अत्यंत असंभावित प्रतीत होती है। अदालत ने कहा कि अविश्वसनीय और अनिश्चित साक्ष्यों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला उन्हीं गवाहों की गवाही पर आधारित था, जिसे अदालत ने अविश्वसनीय पाया। ऐसे में ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इन कमियों को नजरअंदाज कर दोषसिद्धि करना एक गंभीर त्रुटि थी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित नहीं कर पाया, तो कानून के अनुसार आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए। इसी आधार पर तीनों आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया गया।