इमरजेंसी के 50 साल: रविशंकर प्रसाद का कांग्रेस पर हमला, बोले- इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाने के लिए लगाया गया था आपातकाल

इमरजेंसी के 50 साल: रविशंकर प्रसाद का कांग्रेस पर हमला, बोले- इंदिरा गांधी की कुर्सी बचाने के लिए लगाया गया था आपातकाल

आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा के 50 वर्ष पूरे होने पर भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 में लगाया गया आपातकाल देशहित में नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता बचाने के लिए लगाया गया था।

गुरुवार को नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा दौर था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया और संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाया।

प्रसाद ने कहा, “आज कई लोग लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की बात करते हैं, लेकिन देश को यह भी याद रखना चाहिए कि 50 साल पहले क्या हुआ था। मैं स्वयं जेपी आंदोलन का कार्यकर्ता रहा हूं और आपातकाल के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा रहा हूं।”

उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किए जाने के बाद राजनीतिक संकट पैदा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें पूर्ण राहत नहीं मिली थी। भाजपा सांसद का आरोप है कि इसी परिस्थिति में सत्ता बचाने के लिए आपातकाल का सहारा लिया गया। उन्होंने कहा कि आपातकाल का सबसे बड़ा उद्देश्य इंदिरा गांधी की कुर्सी को बचाना था।

रेखा गुप्ता ने बताया लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय

इस बीच, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी 25 जून 1975 को लागू किए गए आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का “सबसे काला अध्याय” बताया। केंद्र सरकार द्वारा मनाए जा रहे ‘संविधान हत्या दिवस’ के अवसर पर उन्होंने कहा कि उस दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंची थी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया गया, प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाया गया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया गया। उन्होंने इसे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की तानाशाही मानसिकता का प्रतीक बताया।

क्या था आपातकाल?

भारत में आपातकाल 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू किया गया था, जो मार्च 1977 तक प्रभावी रहा। इस अवधि को स्वतंत्र भारत के सबसे विवादास्पद राजनीतिक दौरों में गिना जाता है।

आपातकाल के दौरान कई विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई और सरकार की विभिन्न नीतियों को लेकर व्यापक विवाद सामने आए। इनमें जबरन नसबंदी अभियान और शहरी सौंदर्यीकरण कार्यक्रम भी शामिल थे। बाद में आपातकाल समाप्त होने के बाद इसकी समीक्षा के लिए जांच समितियां गठित की गईं और भविष्य में ऐसी शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी और संवैधानिक संशोधन किए गए।

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