‘जजों ने बिना डरे…’ जस्टिस भुइयां और रिटायर्ड जज नरीमन के बयान पर बोले अभिषेक मनु सिंघवी
सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश जस्टिस उज्जल भुइयां और रिटायर्ड जज रोहिंटन फली नरीमन ने एसआईआर को लेकर बयान दिया है जिसके बाद बवाल हो गया है. विपक्ष को एक और मौका दे दिया है. इस बयान के बाद से विपक्ष सरकार पर निशाना साध रही है. सीनियर एडवोकेट और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने अब इस पर रिएक्ट किया है.
कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि “रिटायर्ड जस्टिस नरीमन एक वकील, लॉ ऑफिसर और जज, तीनों ही भूमिकाओं में बहुत विद्वान व्यक्ति माने जाते हैं. जस्टिस भुइयां हमारे सबसे सम्मानित और बेबाक लोगों में से एक हैं, जो बिना किसी डर या झिझक के अपनी बात रखते हैं.”
उन्होंने निडर होकर अपनी बात कही
उन्होंने कहा, ”रिटायर्ड जस्टिस नरीमन एक ऐसे विषय पर बोल रहे थे जिसके शीर्षक में ‘आम आदमी’ शब्द शामिल था. जस्टिस भुइयां NALSAR यूनिवर्सिटी में युवाओं की एक सभा में बोल रहे थे. उन दोनों ने वोट की अहमियत कम होने और वोट खत्म होने के बारे में बात की. लोकतंत्र में आम आदमी पर इससे ज्यादा असर किस चीज का हो सकता है? उन्होंने जो कहा, उसमें कुछ भी नया नहीं है. नई बात है उनका निडर होना, अपनी बात को स्पष्ट और बेबाकी से कहना. मुझे उम्मीद और भरोसा है कि भारत में सिविल सोसाइटी के और भी कई वर्ग – इंजीनियर, डॉक्टर, आर्किटेक्ट, वकील, गृहिणियां – इस पर सोचेंगे और इसी तरह निडर होकर अपनी बात रखेंगे. मैं उनकी सोच और बात को साफ-साफ कहने की हिम्मत और निडरता का स्वागत करता हूं.”
क्या है मामला
जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी में वोटर लिस्ट को लेकर कहा. उन्होंने कहा, ”लाखों भारतीय नागरिकों से उनके मतदान करने के अधिकार से छीनने वाली प्रक्रिया को किसी भी तरह के दलीलों के जरिए सही नहीं ठहराया जा सकता है. यह संविधान के मूल ढांचे पर हमला करती है और मैं यहां तक कहूंगा कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था में निषेध है, जिसे हमने भारत के संविधान के तहत अपनाया है.”
रिटायर्ड जस्टिस नरीमन को इस बात का अफसोस है कि बंगाल में 90 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रोसेस पर रोक नहीं लगाई. उन्होंने कहा, ‘पश्चिम बंगाल चुनावों में 90 लाख वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया. ये एक चौंकाने वाला आंकड़ा है. 90 लाख वोटरों का अधिकार छिन जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया.
