तौकीर रजा को हाई कोर्ट से झटका, जमानत याचिका खारिज
बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ‘सर तन से जुदा’ नारे को कानून के शासन और देश की संप्रभुता के लिए चुनौती बताया
New Delhi : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2025 के बरेली हिंसा मामले में जेल में बंद इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (IMC) के संस्थापक मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने सोमवार को दिए आदेश में कहा कि मामले के रिकॉर्ड और परिस्थितियों को देखते हुए तौकीर रजा को जमानत पर रिहा करने का आधार नहीं बनता।
अदालत ने कहा कि तौकीर रजा के खिलाफ 21 दिसंबर 2025 को आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, हालांकि अभी आरोप तय होना बाकी है। कोर्ट ने घटना के बाद दिए गए उनके भाषण और उसमें लगाए गए नारे को भी गंभीरता से लिया।
भीड़ जुटाने और हिंसा भड़कने का आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 26 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद तौकीर रजा ने मुस्लिम समुदाय के लोगों से इस्लामिया इंटर कॉलेज परिसर में एकत्र होने का आह्वान किया था। यह आह्वान ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान के समर्थन में प्रस्तावित रैली की अनुमति नहीं मिलने के विरोध में किया गया था।
उस समय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू थी। इसके बावजूद करीब 200 से 250 लोग जमा हुए और मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की ओर मार्च करने लगे।
पुलिस के मुताबिक, भीड़ ने भड़काऊ नारे लगाए और पुलिस की चेतावनी को नजरअंदाज किया। बाद में स्थिति हिंसक हो गई। आरोप है कि भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर पथराव किया, तेजाब से भरी बोतलें फेंकी और गोलीबारी भी की।
पुलिसकर्मियों की वर्दी फाड़ने और मारपीट का आरोप
एफआईआर के मुताबिक, हिंसा के दौरान पुलिसकर्मियों की वर्दी फाड़ दी गई और दो अधिकारी घायल हुए। पुलिस का कहना है कि भीड़ की आक्रामकता के कारण इलाके में भय का माहौल पैदा हो गया था, जिसके बाद पुलिस को आत्मरक्षा में हवा में गोलियां चलानी पड़ीं।
हाई कोर्ट ने कहा कि स्थानीय प्रशासन से अनुमति लिए बिना बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र किया गया। अदालत के अनुसार, पुलिस द्वारा रोके जाने पर भीड़ ने मारपीट की और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के कृत्य को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
हिंसा के बाद लोगों को धन्यवाद देने पर भी कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने यह भी कहा कि घटना के बाद याचिकाकर्ता ने लोगों को धन्यवाद दिया और उनके कृत्यों की प्रशंसा की। कोर्ट ने इसे भी उचित नहीं माना।
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने अदालत में दलील दी कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा” जैसा नारा कानून के शासन के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देता है। हाई कोर्ट ने इस दलील में दम माना।
धार्मिक उद्घोषों से नहीं की जा सकती नारे की तुलना
अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता की इस दलील से भी सहमति जताई कि इस नारे की तुलना “नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर”, “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”, “जय श्री राम” या “हर हर महादेव” जैसे धार्मिक उद्घोषों से नहीं की जा सकती।
कोर्ट के मुताबिक, इन धार्मिक उद्घोषों में संबंधित धर्म के भगवान या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है, जबकि विवादित नारे का स्वरूप अलग है।
तौकीर रजा 13 अक्टूबर 2025 से जेल में हैं। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद फिलहाल उन्हें जमानत नहीं मिल सकी है।
