₹2,000 से ऊपर UPI पेमेंट पर MDR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची PIL

₹2,000 से ऊपर UPI पेमेंट पर MDR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची PIL

याचिका में केंद्र के नए MDR फ्रेमवर्क को दी गई चुनौती, 0.4% शुल्क और ₹300 की अधिकतम सीमा पर उठाए सवाल

नई दिल्ली। ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट UPI (P2M) ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस संबंध में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर नए नियमों को रद्द करने या उन पर रोक लगाने की मांग की गई है।

वकील अंजन दत्ता की ओर से वकील आशुतोष दुबे के माध्यम से दायर याचिका में 14 सितंबर 2026 को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A के तहत जारी गैजेट नोटिफिकेशन और 15 सितंबर को घोषित MDR फ्रेमवर्क को चुनौती दी गई है। नया फ्रेमवर्क 15 अक्टूबर 2026 से लागू होना प्रस्तावित है।

₹2,000 से ऊपर 0.4% MDR का प्रावधान

नए फ्रेमवर्क के तहत सामान्य P2M UPI ट्रांजैक्शन में ₹2,000 से अधिक की राशि पर 0.4 प्रतिशत MDR का प्रावधान किया गया है। ₹75,000 या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन पर MDR की अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है। वहीं, कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग फ्लैट रेट निर्धारित किए गए हैं।

सरकार के अनुसार यह शुल्क सीधे ग्राहक से वसूलने के लिए नहीं है, बल्कि मर्चेंट पेमेंट इकोसिस्टम में बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और UPI ऐप प्रोवाइडर्स के बीच वितरित किया जाएगा। ₹2,000 तक के मर्चेंट भुगतान और सभी P2P UPI ट्रांजैक्शन मुफ्त बने रहेंगे।

₹2,000 की सीमा को लेकर याचिका में सवाल

याचिकाकर्ता ने ₹2,000 की सीमा तय करने के आधार पर सवाल उठाए हैं। याचिका में कहा गया है कि इस सीमा, अलग-अलग सेक्टर के लिए निर्धारित दरों और ₹75,000 की अधिकतम सीमा के पीछे इस्तेमाल किए गए डेटा, लागत अध्ययन या निर्धारित पद्धति को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

याचिका में ₹2,000 और ₹2,001 के ट्रांजैक्शन के बीच पैदा होने वाले अंतर को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, ₹2,000 तक का भुगतान शुल्क से मुक्त रहेगा, जबकि केवल ₹1 अधिक यानी ₹2,001 के भुगतान पर प्रतिशत आधारित MDR लागू हो सकता है। याचिका में इसे अचानक शुल्क बढ़ने वाली स्थिति बताते हुए इसके संभावित प्रभावों पर सवाल उठाया गया है।

फ्रेमवर्क की प्रक्रिया और कानूनी आधार पर भी सवाल

PIL में MDR की दरें और अलग-अलग श्रेणियां तय करने की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों के लिए स्पष्ट कानूनी मानक, पारदर्शिता और पर्याप्त नियामकीय निगरानी जरूरी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि व्यापक स्तर पर वित्तीय प्रभाव डालने वाला फ्रेमवर्क पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और सार्वजनिक जानकारी के बिना तैयार किया गया है।

सरकार और UPI व्यवस्था से जुड़े रिकॉर्ड मांगे

याचिका में MDR व्यवस्था से जुड़े रिकॉर्ड भी अदालत के सामने पेश करने की मांग की गई है। इसमें फ्रेमवर्क का कानूनी आधार, UPI स्टीयरिंग कमिटी के गठन और अधिकार, बैठकों के मिनट्स तथा MDR दरों के निर्धारण से संबंधित दस्तावेज शामिल हैं।

याचिकाकर्ता ने UPI इकोसिस्टम में बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और अन्य निजी भागीदारों के बीच शुल्क के बंटवारे के कानूनी आधार की जानकारी भी मांगी है।

PIL में सुप्रीम कोर्ट से नए MDR फ्रेमवर्क को रद्द करने अथवा उस पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है। मामले में आगे अदालत की सुनवाई और संभावित निर्देश इस बात पर महत्वपूर्ण होंगे कि नए शुल्क ढांचे पर न्यायिक स्तर पर क्या रुख सामने आता है।

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