सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: किरायेदार की पर्यावरणीय गलती का जिम्मेदार नहीं होगा मकान मालिक, 25 लाख रुपये जुर्माने पर लगी रोक
पर्यावरण नियमों के उल्लंघन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी किरायेदार द्वारा किए गए पर्यावरणीय उल्लंघनों के लिए मकान मालिक को स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। शीर्ष अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें एक मकान मालिक पर लगाए गए 25 लाख रुपये के पर्यावरणीय मुआवजे को रद्द कर दिया गया था।
NGT के फैसले में हस्तक्षेप से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सोमवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (GPCB) की याचिका खारिज कर दी। बोर्ड ने NGT के 14 नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसमें दखल देने से इनकार कर दिया।
दरअसल, NGT ने सूरत के निवासी जगमोहन लचीराम जालान को राहत देते हुए कहा था कि उनके किरायेदार द्वारा संचालित केमिकल यूनिट के कारण हुए पर्यावरणीय उल्लंघनों के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद एक ऐसी रासायनिक इकाई से जुड़ा है, जो ‘डाई-इंटरमीडिएट’ निर्माण का काम करती थी। गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में पाया गया कि यूनिट से निकलने वाले अपशिष्ट जल (वेस्ट वॉटर) में प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक था। इसके बाद बोर्ड ने पर्यावरणीय क्षति का हवाला देते हुए 25 लाख रुपये का मुआवजा लगाया।
हालांकि, यह यूनिट जिस परिसर में संचालित हो रही थी, उसका मालिक जगमोहन जालान था, जबकि संचालन एक निजी कंपनी कर रही थी, जिसे परिसर किराए पर दिया गया था।
मकान मालिक ने दी थी अनभिज्ञता की दलील
जगमोहन जालान का कहना था कि उन्होंने वर्ष 2020 में कानूनी समझौते के तहत यह परिसर किराए पर दिया था और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि वहां बिना आवश्यक अनुमति के औद्योगिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
उन्होंने बाद में संबंधित किरायेदार के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई और मामले को लेकर गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट के निर्देश पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मामले की दोबारा समीक्षा की, लेकिन 2024 में भी जुर्माना बरकरार रखा गया था।
NGT और सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
NGT ने अपने आदेश में माना था कि केवल संपत्ति का मालिक होना किसी व्यक्ति को किरायेदार की अवैध गतिविधियों के लिए जिम्मेदार नहीं बनाता, खासकर तब जब उसके खिलाफ प्रत्यक्ष संलिप्तता या जानकारी के ठोस प्रमाण न हों।
अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस निष्कर्ष से सहमति जताते हुए NGT के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत के इस निर्णय को संपत्ति मालिकों के अधिकारों और पर्यावरणीय जवाबदेही के दायरे को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है।
फैसले का व्यापक असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहां किराए पर दी गई संपत्तियों में संचालित इकाइयों द्वारा पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन किया जाता है। अदालत ने संकेत दिया है कि जवाबदेही तय करते समय वास्तविक संचालक और उल्लंघन करने वाले पक्ष की भूमिका को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि केवल संपत्ति के स्वामित्व को।
