गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग हो अनिवार्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट का DGP को निर्देश
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180 के तहत दर्ज किए जाने वाले गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने पर विचार किया जाए। अदालत ने कहा कि इससे आपराधिक मामलों की जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
यह निर्देश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने आगरा जिले से जुड़े दहेज के एक मामले में चंद्रकांत की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
जांच अधिकारी ने मानी गलती
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने मौजूद जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि उसने BNSS की धारा 180 के तहत प्रथम सूचना देने वाले व्यक्ति का बयान दर्ज करते समय उसकी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की थी।
अदालत ने इस पर सवाल उठाते हुए DGP की ओर से जारी संबंधित परिपत्रों का भी जिक्र किया। कोर्ट ने जब 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 को जारी परिपत्रों के बारे में जानकारी मांगी तो जांच अधिकारी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी।
कई मामलों में रिकॉर्डिंग नहीं होने पर चिंता
हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जहां जांच अधिकारियों ने DGP के परिपत्र में उपलब्ध विकल्प के बावजूद गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की।
अदालत के अनुसार, कुछ मामलों में जांच अधिकारी इस आशंका के कारण भी रिकॉर्डिंग नहीं करते कि उन पर गवाह का बयान खुद लिखने या FIR की नकल करने का आरोप लग सकता है।
रेप पीड़िता के बयान की रिकॉर्डिंग अनिवार्य
कोर्ट ने कहा कि DGP के परिपत्र संख्या 24/2025 में रेप पीड़िता के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की गई है। हालांकि, अन्य गवाहों के बयानों की रिकॉर्डिंग को फिलहाल वैकल्पिक रखा गया है।
अदालत ने कहा कि इस विकल्प का कई जांच अधिकारियों द्वारा व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसलिए DGP को निर्देश दिया गया कि BNSS की धारा 180 के तहत दर्ज होने वाले सभी बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य करने की संभावना पर विचार करें।
निष्पक्ष जांच में मिलेगी मदद
हाईकोर्ट ने DGP को अपने निर्देश से सभी जांच अधिकारियों को अवगत कराने को भी कहा। अदालत का मानना है कि गवाहों के बयान रिकॉर्ड होने से जांच प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बन सकती है।
इससे जांच के दौरान बयान दर्ज करने को लेकर उठने वाले विवादों को कम करने और वास्तविक तथ्यों को सामने लाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, अदालत ने संकेत दिया कि पारदर्शी जांच से गलत तरीके से किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान किए जाने की संभावना भी कम हो सकती है।
