मुददा: मजदूरो के पलायन पर कहाँ गई सरकारो की संवेदनशीलता?

 
Palayan

[इंद्रेश] कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया मे हा हाकार मचा रखा है। प्रतिदिन हजारों लोग कोरोना के शिकार हो रहे है। ऐसे जन जीवन को बचाये रखने के लिये केंद्र सरकार को देश में लाकडाउन करने का निर्णय लेना पडा। लाकडाउन ने आमजन को घरों के अंदर रहने को मजबूर कर दिया है। साथ ही इस लाकडाउन के कारण हजारों लोग जंहा-तंहा फंस गये।

हमारी सरकार ने कई मौकों पर एक संवेदनशील सरकार के रूप मे काम किया है। वह चाहे खाडी देशों मे फंसे भारतीयों को वापस लाने का मौका हो या फिर कोरोना के दौरान वुहान, इटली, जापान, इरान व स्पेन जैसे देशो से भारतीयों को एअरलिफट करने का कार्य रहा हो। पंरतु सरकार की यह सवेंदशीलता घरेलु मौकेा पर दिखायी नंही देती। सवेंदनशील सरकार की छवि घरेलु मोर्चे पर कंहा गायब हो जाती इसका पता नंही चलता।

प्रधानमंत्री की लाकडाउन की घोषणा के साथ ही पूरे देश में वाहनों के पहिए थम गये। काम की तलाश मे अपने घरो से हजारों किमी दूर बडे शहरो में गये मजदूर, मेहनतकश, फंस कर रह गये। वे अपने घरों को जाने के लिये छटपटा रहे है। यातायात के साधन न मिलने के कारण सेंकडो लोग अपने बीबी बच्चों को लेकर पैदल ही अपने घरो की ओर चल पडे। लोग भूखे प्यासे अपनी मंजिल की ओर चले जा रहे है। पंरतु हालत यह है कि पहले तीन दिन किसी के कानों पर जुं तक नंही रेंगी। मिडिया के कैमरो की नजर ऐसे व्यक्तियों पर पडती है तो शासन प्रशासन में बैठे लोग कुछ मिडिया के लोग गरीब लोगों को जंहा की है वंही रहने की नसीहते देने में जुट जाते है।

यंहा प्रश्न यंह है कि कोरोना फैलने की आंशका विदेश से हवाई जहाजो से लाये गये व्यक्तियों पर भी लागु होती है। तो फिर क्या ऐसे लोग अमीर थे? उनके घर न आने से उनके परिजनों का सरकार पर भारी दबाव था। इसलिये सरकार ने उन्हे हवाई जहाज से ऐअरलिफट करके देश मे कोरोना महामारी के फैलने का रिस्क उठाया। दुसरी ओर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों से मजबूरी में अपने घरों को जाने वाले लोग गरीब है उनके परिजन सरकार पर मिडिया या अन्य माध्यमों से दबाव डालने में सक्षम नंही है, इसलिये उन्हे घर जाने की सहूलिते देने के बजाये वंही पर रूके रहने की नसीहत दी जा रही है।

अंतिम समय में भी हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि यदि उसकी मृत्यु भी हो तो उसके घर पर हो। पंरतु क्या गरीबों को यह भी हक नही है कि वे इस विपत्ति के समय में अपने घर पर रह सके। यह सही है कि बडे पैमाने पर पलायन होने पर कोरोना के फैलने मे तेजी आने की आंशका है। विदेशों से एअरलिफ्ट कर लाये गये संक्रमित लोगों को चौदह दिनों के लिये क्वारांटीन किया जा सकता है तो गरीब मजदूरों को भी उनके घरो पर क्वारिटीन क्यों नंही किया जा सकता था? पंरतु ऐसा लगता है कि सरकार ने संपूर्ण लाकडाउन से पहले न तो होम वर्क किया और न ही इतने बडे पैमाने पर होने वाले पलायन के प्रबंधन की तैयारी की। गरीब मजदूरो का उनके हाल पर छोड दिया गया।

दिल्ली जैसे महानगर में उनके खाने-पीने की दिल्ली या केंद्र सरकार ने क्या व्यवस्था की? चार दिनों के बाद दिल्ली सरकार एक लाख लोगो के खाने की व्यवस्था करने का दावा कर रही है। जबकि अकेले दिल्ली शहर मे ही बाहर से आने वाले मजदुरों की संख्या कंही अधिक है। ऐसे में क्या इन गरीबों को भूखों मरने के लिये छोडा जा सकता है। क्या यह एक सेवंदनशील सरकार का काम हो सकता है? अब सवाल यह है कि आखिर सरकार को पलायन करने वाले व्यक्तियों को संभालने के लिये क्या करना चाहिए?

सबसे पहले इन व्यक्तियों को यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि उन्हे उनके घरों तक पहुचाने की उचित व्यवस्था की जा रही है। इसके साथ ही उनके घरो तक जाने तक उनके रहने व खाने की एक अच्छी व्यवस्था की जानी चाहिए और यह व्यवस्था केवल बयानबाजी तक सीमित न हो बल्कि धरातल पर व तेज गति के साथ हो। तीसरे केंद्र व राज्य सरकारों के बीच समन्वय के साथ उनके घरो तक पहुचाने के लिये यातायात की पूरी चाकचौबंद व्यवस्था हो। इसके लिये एक दो दिनों के लिये रेल गाडियों को भी चलाया जाना शामिल है।

अगर सरकार नही चेती तो महामारी से होने वाली टरेजडी तो बाद मे होगी उससे पहले पलायन से बडे पैमाने पर टरेजडी होने से कोई नंही रोक पायेगा। जिसकी जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकारों की ही होगी।

 
 
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