लॉकडाउन में पैदल घर लौट रहे ये मजदूर बीजेपी को महंगे पड़ेंगे?

 

 

  • लॉकडाउन के बावजूद अपने घरों की तरफ पैदल निकल पड़े हजारों की संख्‍या में प्रवासी मजदूर
  • रास्‍ते में लाख परेशानियां झेलीं, ना खाने को ठीक से मिला, ना पीने को पानी
  • लॉकडाउन की वजह से दो हिस्‍सों में बंटता नजर आ रहा भारतीय समाज
  • बीजेपी को सता रहा डर, कहीं गरीबों की नाराजगी का असर चुनावी नतीजों पर पड़ा तो…

नई दिल्‍ली
भारतीय जनता पार्टी के सीनियर लीडर्स की एक मीटिंग गुरुवार को पार्टी चीफ जेपी नड्डा के घर पर हुई। लॉकडाउन की घोषणा के बाद, बीजेपी के बड़े नेता पहली बार मिले हैं। इसमें गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने हिस्‍सा लिया। देश के कोरोना से उपजे हालात पर चर्चा के लिए यह मीटिंग बुलाई गई थी। मगर इसमें मुद्दा छाया रहा प्रवासी मजदूरों का। पार्टी अपने नेताओं से यही जानना चाहती थी कि जो हालात अभी बने हैं, उन्‍हें सुधारने के लिए क्‍या किया जा सकता है। बीजेपी ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे रोड पर मौजूद मजदूरों की यथासंभव मदद करें। बीजेपी अब प्रवासी मजदूरों की सुध क्‍यों ले रही है? इसके पीछे पार्टी का एक डर बड़ी वजह है। वो डर है अपना वोट-बैंक खोने का।

पीएम का भी श्रमिकों पर जोर
तीन दिन पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संबोधन में कहा था कि ‘हमारे रेहड़ी, ठेला लगाने वाले, पटरी पर सामान बेचने वाले हैं, श्रमिक साथी हैं, घरों में काम करने वाले भाई-बहन हैं। उन्होंने इस दौरान बहुत कष्ट झेले हैं, तपस्या की है, त्याग किया है। ऐसा कौन है जिसने उनकी अनुपस्थिति को महसूस नहीं किया। अब हमारा कर्तव्‍य है उन्हें ताकतवर बनाने का।’ उन्‍होंने राज्‍यों से कहा है कि वे मजदूरों को उनके राज्‍य भेजने की व्‍यवस्‍था करें क्‍योंकि उन्‍होंने घर लौटने का मन बना लिया है।

लगातार बना हुआ है संकट
24 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने राष्‍ट्र के नाम संदेश में लॉकडाउन का ऐलान किया था। रात 8 बजे का यह ऐलान महज चार घंटों बाद, 25 मार्च की रात से लागू हो गया। उस वक्‍त शायद किसी को भी ये अंदाजा नहीं रहा होगा कि माइग्रेशन की इतनी बड़ी समस्‍या खड़ी हो जाएगी। केंद्र सरकार को स्थिति की भयावहता का अंदाजा शायद अप्रैल के आखिरी दिनों में हुआ। तभी तो 1 मई से ‘श्रमिक स्‍पेशल’ ट्रेनें चलाने का फैसला किया गया। मगर प्रवासी मजदूरों की संख्‍या लाखों में थी। आधा मई गुजर चुका है और मजदूर अबतक सड़कों पर हैं। उनके भीतर गुस्‍सा है क्‍योंकि जब उन्‍हें सरकारी मदद की सबसे ज्‍यादा जरूरत थी, वे ठोकर खाने को मजबूर थे। बीजेपी शायद इस बात को महसूस कर पा रही है। इस मुद्दे पर अब वह बैकफुट पर है। देश के बंटवारे के बाद पलायन का ऐसा दौर कभी नहीं देखा गया था। इसलिए बीजेपी को टेंशन होनी लाजिमी है।

मां-बेटे की इस तस्वीर पर जार-जार रोया इंटरनेट

मां-बेटे की इस तस्वीर पर जार-जार रोया इंटरनेटट्रॉली बैग पर निढाल होकर सोया बच्चा और सड़क पर उसे खींचते हुए चल रही मां। ये लॉकडाउन में अपने घरों को पैदल लौटते प्रवासी मजदूरों की दिल तोड़ने वाली एक और तस्वीर भर नहीं है, ये एक बहुत बड़ा सवाल उस व्यवस्था पर जो देश के मजदूरों को, गरीबों को ये भरोसा नहीं दिला पा रही कि उन्हें उनके घर तक सुरक्षित पहुंचा दिया जाएगा। देखिए ये वीडियो रिपोर्ट।

गरीब ही बनाते-बिगाड़ते हैं सरकार
मार्च में एक सवाल के जवाब में सरकार ने संसद में कहा था कि देश में करीब 10 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं। इनमें से बहुतों को लॉकडाउन ने गहरी चोट दी है। भारत में वोटिंग के पैटर्न को देखें तो यह गरीब तबका किंगमेकर की भूमिका में रहता है। 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी ने 2014 के मुकाबले अपना बेस मजबूत किया है। उसका वोट शेयर 31.1% से बढ़कर 37.4% हो गया। देश के एक-तिहाई (34%) दलितों ने 2019 में बीजेपी को वोट दिया। गांवों में भी बीजेपी का वोट 7.4 पर्सेंटेज पॉइट्स बढ़ा।

कहीं खो ना जाए बीजेपी की बढ़त
आर्थिक रूप से कमजोर तबका बीजेपी के चुनावी पराक्रम की मुख्‍य वजह रहा है। 2014 से शुरू हुई वो लहर 2019 में और मजबूत ही हुई। सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ डेवलपिंग साइंस (CSDS) की 2019 और 2014 के नतीजों पर रिसर्च बताती है कि गरीब तबके के वोटों में बीजेपी ने सबसे ज्‍यादा फायदा हासिल किया। 2014 में बीजेपी को गरीबों के बीच जहां 24 फीसदी वोट मिले थे, 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 36% हो गया। प्रवासी मजदूरों के संकट से बीजेपी को सबसे बड़ा डर इसी बढ़त को खोने का है।

सूटकेस पर ही सो गया बच्चा

  • सूटकेस पर ही सो गया बच्चा

    छोटा सा बच्चा आखिर कितना चलता, आखिरकार वह सूटकेस पर ही सो गया। इसे बच्चे की मां खींचकर पंजाब से खींचकर आगरा तक लाई थी। उन्हें झांसी जाना था। कुल सफर 800 किलोमीटर का था।
  • तू थक गया होगा, ऐसे ही सो ले

    पैदल चलते-चलते इस बच्‍चे के पैर जवाब दे गए। नींद आंखों में छाने लगी तो क्‍या करते। मां ने सूटकेस पर यूं लिटाया और चलती रही। घर भी तो पहुंचना है।

     

  • जुगाड़ की गाड़ी पर गर्भवती पत्नी और बेटी को बिठाया, 17 दिन में 800KM चला

    लॉकडाउन की वजह से हैदराबाद में रहे रामू की रोजी छिन गई। लाचार और बेबस रामू के पास घर लौटने के लिए भी को रास्ता नहीं बचा था। रामू हैदराबाद से पत्नी और बेटी के साथ पैदल चल दिया। लेकिन गर्भवती पत्नी के लिए 800 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना आसान नहीं था। 10-15 किलोमीटर चलने के बाद रामू ने जुगाड़ से एक हाथ गाड़ी बनाई। हाथ गाड़ी पर ही उसने अपनी पत्नी और नन्ही बिटिया को बिठाया। उसके बाद पैदल ही हैदरबाद से खींचते हुए चल दिया। वह हाथ गाड़ी पर सामान बांधकर पत्नी और बेटी को खींचकर 17 दिन तक ऐसे ही चलता रहा। मंगलवार को वह बालाघाट जिले की सीमा रजेगांव पर पहुंचा।
  • मां तो मां है

    नागपुर की यह तस्वीर देखिए। बेटे को कंधे पर बैठकर ले जाती मां।
  • टॉइलट में रहा, खाना भी वहीं खाया

    ऊपर जो शख्स आपको दिख रहा है वह कालिया बिंडानी है। 30 साल का मजदूर ओडिशा का है। वहीं के गंजम जिले में यह मजदूरी करता था। लॉकडाउन के बाद किसी तरह अपने गांव जो कि ओडिशा में ही है वहां पहुंचा। लेकिन गांववालों ने उसे गांव में घुसने नहीं दिया। फिर तीन उसने गांव के पास खाली टॉइलट में गुजारे।
  • ...बहुत दूर जाना है

  • अभी तो खाना मिल गया, आगे क्या?

बीजेपी के लिए चिंता की बात क्‍यों?
देशभर से प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा की रिपोर्ट्स आ रही हैं। जो पैदल चलते-चलते दम तोड़ गए, उनकी कोई गिनती नहीं हुई। हादसों में करीब 100 मजदूर जान गंवा चुके हैं। पॉलिटिकल एनालिस्‍ट्स मानते हैं कि लॉकडाउन के बाद उपजे हालात ने देश को दो अलग-अलग धड़ों में बांट दिया है। एक हिस्‍सा वो है जो घरों में है और लॉकडाउन के दिन किसी तरह काट रहा है। दूसरा तबका अपने भविष्‍य को लेकर निराशा में डूबा हुआ है। बहुतों की सैलरी कटी है, लाखों नौकरियां गई हैं। प्रवासी मजदूरों का संकट बीजेपी की ‘मिडल क्‍लास की पार्टी’ वाली छवि को और पुख्‍ता कर दे रहा है। पिछले 6 साल के शासन के दौरान प्रो-गरीब सरकार की जो छवि बनाई गई थी, वह टूट गई है।

गरीब तबका हो सकता है बीजेपी से दूर
पीएम मोदी ने खुद को ‘चायवाले’ के रूप में पेश कर गरीबों से सीधा कनेक्‍ट किया था। वह अपने भाषणों में बार-बार अपनी गरीबी के दिनों की याद दिलाते हैं। मगर गरीबों का जो वोट-बैंक तैयार हुआ था, उसमें बड़ी संख्‍या इन प्रवासी मजदूरों की है। बीजेपी को सत्‍ता में लाने के पीछे गरीबों का समर्थन एक बड़ी वजह है। सरकार ने जिस तरह से लॉकडाउन में कदम उठाए, उससे मजदूरों को कोई खास फायदा नहीं हुआ। कर्नाटक में भी बीजेपी सरकार ने पहले मजदूरों के लिए ट्रेन कैंसिल कर दी थी। बवाल हुआ तो यू-टर्न ले लिया। ऐसी बातों से बीजेपी की इमेज को खासा नुकसान पहुंचा है। उसकी भरपाई आसान नहीं होगी।

दिल्ली से झांसी पैदल जा रही मां का दर्द रुला देगा

दिल्ली से झांसी पैदल जा रही मां का दर्द रुला देगालगभग दो महीने के इंतजार के बाद भी जब दिल्ली में रहने वाले यूपी के कुछ प्रवासी मजदूरों को अपने घर लौटने का कोई साधन नहीं मिला, तो ये लोग आज सुबह दिल्ली-यूपी बॉर्डर के बाद पैदल ही अपने गांवों की ओर जाते दिखे। उन्हीं लोगों में शामिल थीं बबीता जो झांसी की रहने वाली हैं। अपने बच्चे से दूर रह रहीं बबीता ने बयां किया अपना दर्द।

अब गरीबों को ध्‍यान में रखकर किए ऐलान
केंद्र सरकार ने दो दिन पहले 20 लाख करोड़ रुपये के स्टिमुलस पैकेज की घोषणा की। वित्त मंत्री ने गरीब मजदूरों के लिए एक अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग स्कीम का ऐलान किया है। उन्होंने कहा भी कि प्रवासी मजदूर, किसान और गरीब हमारी प्राथमिकता है।

प्रवासी मजदूरों के लिए क्या?

  • 2 महीनों के लिए प्रवासी मजदूरों के लिए मुफ्त अनाज
  • बिना कार्ड के भी चावल/गेहूं और चना मिल सकेगा।
  • राज्य सरकारों की जिम्मेदारी होगी कि उन तक कैसे अनाज पहुंचाया जाए।
  • केंद्र सरकार इसका खर्च उठाएगी, 3500 करोड़ रुपये का आएगा खर्च।
  • 10 से कम कर्मचारियों वाली कंपनी में ईएसआई की सुविधा होगी।
  • जो नैशनल फूड रजिस्टर में नहीं आते उनको भी मिलेगा। 8 करोड़ प्रवासी मजदूर होंगे लाभान्वित
  • प्रवासी मजदूरों और शहरी गरीबों के लिए अफोर्डेबल रेंटल आवास की योजना लाई जाएगी।
  • जहां मजदूर काम करते हैं, इससे वहीं रहने की सुविधा मिल सकेगी।
  • उद्योगपति अपनी जमीन पर बनाना चाहें तो उन्हें इन्सेंटिव दिया जाएगा या राज्य सरकारों को प्रेरित कर ऐसे आवासीय इंतजाम करवाए जाएंगे।
  • रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाने वालों, ठेला चलाने वालों और यगरों में काम करने वालों के लिए 5000 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएंगे।
  • 50 लाख रेहड़ी वालों के लिए स्पेशल क्रेडिट फेसिलिटी।
  • शुरुआत में वर्किंग कैपिटल करीब 10 हजार रुपये मिलेंगे जिससे कारोबार की शुरुआत हो सके।
  • डिजिटल पेमेंट करने वालों को इनाम मिलेगा। उन्‍हें 10 हजार से ज्यादा राशि मुहैया कराई जा सकेगी।

 

घर पहुंचने के लिए बैलगाड़ी खींच रहा है मजदूर परिवार

घर पहुंचने के लिए बैलगाड़ी खींच रहा है मजदूर परिवारलॉकडाउन में फंसे मजदूर (workers family stuck in lockdown) बस किसी तरह से घर पहुंचना चाहते हैं। जान जोखिम में डालकर भी मजदूर सफर कर रहे हैं। इंदौर बाईपास (indore bypass) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसमें एक मजदूर परिवार (migrant workers family) बैल की मौत के बाद खुद ही बैलगाड़ी खींचकर (pulling bullock cart) घर पहुंचने की कोशिश कर रहा है।

विपक्ष भी लगातार बीजेपी को घेरने में जुटा
प्रवासी मजदूरों का मुद्दा ऐसा है कि विपक्ष ने बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया है। जो 20 लाख का पैकेज केंद्र सरकार ने दिया है, उसपर कांग्रेस का कहना है कि मोदी ने मीडिया को सिर्फ ‘हेडलाइन’ दी, जिसमें प्रवासी श्रमिकों के लिए कोई ‘हेल्पलाइन’ नहीं है। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया था, ‘‘अपने घर जा रहे प्रवासी कामगारों की दिल दहला देने वाली मानवीय त्रासदी को करुणा से देखने तथा मजदूरों की सुरक्षित वापसी की जरूरत है। लाखों प्रवासी श्रमिकों के प्रति आपमें संवेदनशीलता की कमी और उनकी तकलीफों को दूर करने में आपकी नाकामी से भारत बहुत ज्यादा निराश हुआ है।’’

सपा-बसपा ने भी की चोट
बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी दोनों ने केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। दोनों दलों ने आरोप लगाया कि सरकार अमीरों के साथ है। बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने शुक्रवार को एक ट्वीट कर कहा ”देश की सड़कों पर घर वापसी करते लुटे/लाचार लाखों प्रवासी मजदूर व उनके बिलखते परिवारों की भूख, बदहाली व रास्ते में हो रही मौतों के टीवी दृश्य हृदयविदारक व अति-दुःखद हैं। ऐसे में केन्द/राज्य सरकारों द्वारा आज की उनकी जिन्दगी-मौत की लड़ाई से निपटने के लिए कारगर व्यवस्था तत्काल लागू हो।”

वहीं समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट किया ”श्रमिकों को काम पर लाने के लिए तो सरकार उद्योगपतियों को पास दे रही है, पर घर लौट रहे उन बेबस मज़दूरों के लिए कोई इंतज़ाम नहीं जो सड़कों पर भूखे-प्यासे मरने को मजबूर हैं। अब सब जान गये हैं कि ये सरकार अमीरों के साथ है और मज़दूर, किसान, ग़रीब के ख़िलाफ़ है। भाजपा की कलई खुल गई है।”

 
 

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