स्वरा भास्कर फिर विवादों में, ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर छिड़ी बहस; सवाल- ‘मेरा मतलब वो नहीं था’ वाली सफाई क्यों?

स्वरा भास्कर फिर विवादों में, ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर छिड़ी बहस; सवाल- ‘मेरा मतलब वो नहीं था’ वाली सफाई क्यों?

फिल्म ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य को लेकर अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर विवादों में हैं। दिल्ली में आयोजित ‘Woman, Life, Freedom’ कार्यक्रम में उनकी टिप्पणियों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उन पर रानी पद्मावती और जौहर करने वाली महिलाओं का अपमान करने के आरोप लगे। विवाद बढ़ने पर स्वरा ने सफाई दी कि उनकी बात को ‘पूरी तरह गलत तरीके से अनुवादित और प्रसारित’ किया गया है।

लेकिन इस विवाद ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या स्वरा भास्कर के बयानों को बार-बार गलत समझा जा रहा है, या उनकी बात रखने का तरीका ही ऐसा है कि उनके शब्द विवाद का रूप ले लेते हैं और बाद में उन्हें सफाई देनी पड़ती है?

स्वरा ने ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर क्या कहा?

31 अगस्त को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित चर्चा के दौरान स्वरा ने ‘पद्मावत’ के क्लाइमैक्स का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि फिल्म में सैकड़ों महिलाओं को जौहर करते देखकर उनके मन में यह सवाल आया कि यदि कोई महिला आज यौन हिंसा का शिकार होती है, तो वह इस दृश्य और इसके संदेश को किस तरह महसूस कर सकती है।

स्वरा का तर्क था कि ऐसी प्रस्तुति किसी यौन हिंसा पीड़िता को यह संदेश दे सकती है कि जीवित रहना कम सम्मानजनक है और मृत्यु को चुनना अधिक बहादुरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे समाज में, जहां यौन हिंसा आज भी गंभीर समस्या है, क्या फिल्मों को महिलाओं की ‘पवित्रता’ को उनके जीवन से अधिक महत्वपूर्ण दिखाना चाहिए?

उन्होंने जौहर के दृश्य में एक गर्भवती महिला को दिखाए जाने पर भी आपत्ति जताई।

इसके बाद सोशल मीडिया पर यह दावा तेजी से फैलने लगा कि स्वरा ने रानी पद्मावती और जौहर करने वाली महिलाओं को ‘कायर’ कहा है।

विवाद बढ़ा तो स्वरा ने दी सफाई

विवाद के बाद स्वरा ने वीडियो जारी कर कहा कि उन्होंने न तो रानी पद्मावती को कायर कहा और न ही जौहर करने वाली महिलाओं का अपमान किया। उनका कहना था कि उनकी चिंता आधुनिक दौर में यौन हिंसा की पीड़ित महिलाओं तक पहुंचने वाले संदेश को लेकर थी।

स्वरा का मूल तर्क यह था कि किसी महिला के साथ बलात्कार या यौन हिंसा होने के बाद उसके जीवन, सम्मान और अस्तित्व का मूल्य कम नहीं हो जाता। आधुनिक समाज में किसी पीड़िता को आत्महत्या या मृत्यु को सम्मान से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

यह तर्क अपने आप में मानवीय और आधुनिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। लेकिन विवाद की दूसरी परत इतिहास से जुड़ी है।

क्या जौहर को सिर्फ ‘पवित्रता के लिए आत्महत्या’ कहना सही है?

जौहर की ऐतिहासिक चर्चा युद्ध, पराजय, सामूहिक हिंसा, बंदी बनाए जाने और दासता के भयावह संदर्भ में होती है। मध्यकालीन युद्धों में पराजित पक्ष की महिलाओं के सामने यौन हिंसा, दासता, जबरन बंदी बनाए जाने और विजेता की सत्ता के अधीन जीवन बिताने का खतरा मौजूद रहता था।

ऐसे में जौहर को केवल ‘महिलाओं को अपनी पवित्रता बचाने के लिए मरने का संदेश’ मान लेना इतिहास की जटिलता को बेहद सीमित कर देता है।

जौहर का समर्थन आधुनिक समाज में आत्मदाह या आत्महत्या के समर्थन के रूप में नहीं किया जा सकता। लेकिन इतिहास को समझते समय उस समय मौजूद परिस्थितियों और महिलाओं के सामने उपलब्ध विकल्पों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

प्रियंका चतुर्वेदी ने भी उठाए सवाल

इस बहस में शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद रहीं प्रियंका चतुर्वेदी ने भी स्वरा के तर्क का विरोध किया। उनका कहना था कि युद्ध और आक्रमण जैसी चरम परिस्थितियों में महिलाओं के सामने मृत्यु, दासता या विजेता के हरम में जबरन जीवन बिताने जैसी परिस्थितियां हो सकती थीं।

उनके तर्क का सार यह था कि आज की दृष्टि से उस निर्णय से असहमति हो सकती है, लेकिन उन महिलाओं की परिस्थितियों को नजरअंदाज करके उनके फैसले को हल्के ढंग से देखना उचित नहीं है।

‘पद्मावत’ को लेकर स्वरा का विवाद पुराना है

स्वरा भास्कर का ‘पद्मावत’ से जुड़ा विवाद नया नहीं है। जनवरी 2018 में फिल्म की रिलीज के बाद उन्होंने निर्देशक संजय लीला भंसाली को एक खुला पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने फिल्म के जौहर दृश्य और महिलाओं की गरिमा को यौन शुचिता से जोड़ने पर सवाल उठाए थे।

फिल्म में दीपिका पादुकोण ने रानी पद्मावती की भूमिका निभाई थी, जबकि शाहिद कपूर और रणवीर सिंह प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म मलिक मुहम्मद जायसी की 16वीं सदी की रचना ‘पद्मावत’ से प्रेरित थी और रिलीज से पहले ही भारी विवादों में घिर गई थी।

असली सवाल इतिहास बनाम आधुनिक नजरिए का

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या सदियों पुराने ऐतिहासिक घटनाक्रम को आज के नैतिक और सामाजिक मानकों से ही परखा जाना चाहिए?

आधुनिक समाज में महिलाओं के जीवन को उनकी यौन ‘पवित्रता’ से ऊपर रखना जरूरी है। किसी भी यौन हिंसा पीड़िता को अपने जीवन को कमतर समझने का संदेश नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि ऐतिहासिक जौहर को उसके युद्धकालीन और सामाजिक संदर्भ से काटकर न देखा जाए।

इतिहास का अंध-महिमामंडन भी उचित नहीं और आधुनिक नजरिए के नाम पर अतीत की जटिल परिस्थितियों को पूरी तरह खारिज करना भी नहीं।

क्या भाषा विवाद की वजह बन रही है?

स्वरा भास्कर के आलोचक इस पूरे विवाद को केवल उनके विचारों से नहीं, बल्कि उनकी बयानबाजी की शैली से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि स्वरा अक्सर बेहद तीखे अंदाज में अपनी बात रखती हैं, जिसके बाद उनके शब्दों को लेकर विवाद पैदा होता है और उन्हें सफाई देनी पड़ती है।

हालांकि, किसी बयान के वायरल होने के बाद उसके संदर्भ को समझना भी उतना ही जरूरी है। किसी व्यक्ति के शब्दों को काट-छांटकर या संदर्भ से अलग करके पेश करना भी निष्पक्ष बहस का तरीका नहीं हो सकता।

इसलिए इस विवाद में दो बातें अलग-अलग रखनी जरूरी हैं—स्वरा ने वास्तव में क्या कहा और उनके बयान का अर्थ क्या निकाला गया।

‘पद्मावत’ और जौहर को लेकर बहस आगे भी जारी रहेगी। लेकिन यह बहस तभी सार्थक होगी जब इसमें न तो इतिहास का अंध-महिमामंडन हो और न ही आधुनिक विचारधारा के नाम पर इतिहास की जटिल परिस्थितियों को नजरअंदाज किया जाए।

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