राहुल गांधी के बयान से बढ़ी कांग्रेस-DMK की तकरार, दयानिधि मारन ने कहा- ‘विश्वासघात पर बोलने का हक नहीं’
नई दिल्ली: लोकसभा सीटों के संभावित पुनर्गठन और परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जुड़े प्रस्तावित संविधान संशोधन को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के तमिलनाडु दौरे के दौरान दिए गए बयान के बाद कांग्रेस और पूर्व सहयोगी द्रमुक (DMK) के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। इस घटनाक्रम ने विपक्षी राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
राहुल गांधी ने तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि यदि कोई राजनीतिक दल संसद में परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन करता है तो वह तमिलनाडु के हितों के साथ “विश्वासघात” करेगा। उन्होंने ऐसे दलों की तुलना इतिहास में गद्दारी के प्रतीक माने जाने वाले “एट्टप्पन” से भी की। राहुल का यह बयान ऐसे समय आया है जब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल रही है कि DMK इस मुद्दे पर अपने रुख में नरमी ला सकती है।
राहुल गांधी की टिप्पणी पर DMK ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद दयानिधि मारन ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ मंत्री पदों के लिए भरोसा बेचने वालों को विश्वासघात की बात करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कांग्रेस को “जहरीला सांप” करार देते हुए आरोप लगाया कि सत्ता के लिए उसने राजनीतिक रिश्तों और भरोसे का सौदा किया। मारन का संकेत कांग्रेस द्वारा DMK से दूरी बनाकर तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के साथ गठबंधन करने की ओर माना जा रहा है।
दयानिधि मारन ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तमिलनाडु से जुड़े कई अहम मुद्दों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कावेरी जल विवाद पर स्पष्ट रुख न अपनाना, NEET परीक्षा को पूरी तरह समाप्त करने की मांग न करना और कुछ राजनीतिक घटनाक्रमों पर चुप्पी साधना भी तमिलनाडु के हितों के साथ न्याय नहीं है।
इस बीच राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और DMK के बीच बढ़ती दूरी का लाभ भाजपा उठाने की कोशिश कर सकती है। माना जा रहा है कि यदि दोनों दलों के संबंध और अधिक खराब होते हैं तो संसद में परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष की एकजुटता प्रभावित हो सकती है। हालांकि केंद्र सरकार ने अभी तक इस विषय पर किसी नए विधेयक को लाने की औपचारिक घोषणा नहीं की है।
DMK ने फिलहाल अपना अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया है। पार्टी का कहना है कि किसी भी विधेयक का समर्थन या विरोध उसके प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद ही तय किया जाएगा। साथ ही उसने दोहराया कि दक्षिण भारत और विशेष रूप से तमिलनाडु के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया जाएगा।
विपक्षी दलों का आरोप है कि परिसीमन की प्रक्रिया के जरिए लोकसभा क्षेत्रों का ऐसा पुनर्गठन किया जा सकता है जिससे भविष्य में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को राजनीतिक लाभ मिले। इसी आशंका के चलते कई विपक्षी दल पहले से ही इस प्रस्ताव का विरोध करते रहे हैं।
उधर, तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी (TNCC) के अध्यक्ष Manickam Tagore ने भी परिसीमन के मुद्दे पर भाजपा को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन पहले की तरह इस प्रस्ताव का विरोध जारी रखेंगे। टैगोर ने बिना DMK का नाम लिए कहा कि तमिलनाडु की जनता अच्छी तरह जानती है कि अतीत में इस विधेयक का विरोध किसने किया था और उन्हें उम्मीद है कि उस रुख में बदलाव नहीं होगा।
टैगोर ने यह भी कहा कि परिसीमन के समर्थन में भाजपा, पीएमके और एआईएडीएमके पहले से खड़े रहे हैं और अब जनता देखेगी कि इस मुद्दे पर कौन किसके साथ जाता है। उन्होंने कावेरी जल विवाद और मेकेदातु परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच मतभेदों पर भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि दोनों राज्यों के हित अलग हो सकते हैं, लेकिन इस मुद्दे को राजनीतिक टकराव का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।
फिलहाल परिसीमन का मुद्दा केवल संसदीय बहस तक सीमित नहीं रहा है। यह तमिलनाडु की राजनीति, कांग्रेस-DMK संबंधों और विपक्षी एकता की परीक्षा बनता जा रहा है। यदि केंद्र सरकार भविष्य में इस विधेयक को संसद में लाती है, तो सभी की नजरें इस बात पर होंगी कि विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट रहते हैं या बदलते राजनीतिक समीकरण नए गठबंधनों और नए रुख को जन्म देते हैं।
