पीएफ घोटाला: यूपीपीसीएल के पूर्व एमडी एपी मिश्रा हिरासत में, अखिलेश यादव पर लिख चुके हैं किताब

 
  • यूपी में बिजली कर्मचारियों के पीएफ में हुए घोटाले में ईओडब्ल्यू ने अपना शिकंजा कस दिया
  • पुलिस ने मंगलवार को यूपीपीसीएल के पूर्व एमडी एपी मिश्रा को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया
  • पुलिस और ईओडब्ल्यू के अधिकारी पीएफ घोटाले को लेकर उनसे गहन पूछताछ कर रहे हैं

लखनऊ: यूपी में बिजली कर्मचारियों के पीएफ में हुए घोटाले में पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने अपना शिकंजा कस दिया है। पुलिस ने मंगलवार को यूपीपीसीएल के पूर्व एमडी एपी मिश्रा को उनके घर से हिरासत में लिया है। पुलिस और ईओडब्ल्यू के अधिकारी पीएफ घोटाले को लेकर उनसे गहन पूछताछ कर रहे हैं।

बता दें कि एपी मिश्रा को पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी सरकार का बेहद खास चेहरा माना जाता है। अखिलेश सरकार के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे मिश्रा ने यूपीपीसीएल के एमडी रहते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर एक किताब भी लिखी थी जिसका तत्कालीन सीएम अखिलेश ने खुद विमोचन किया था।

पावर कॉरपोरेशन की एमडी अपर्णा पर गाज
उधर सरकार ने सोमवार को पावर कॉरपोरेशन की एमडी अपर्णा यू को भी हटा दिया है। एम देवराज को नया एमडी नियुक्त किया गया है। ईओडब्ल्यू की शुरुआती जांच में पता चला है कि पीएफ के निवेश के लिए कोई टेंडर नहीं हुआ था। महज कोटेशन के जरिए डीएचएफएल में 2,268 करोड़ रुपये लगा दिए गए थे।

ईओडब्ल्यू की टीम सोमवार को शक्ति भवन स्थित यूपी स्टेट पावर सेक्टर एंप्लॉयीज ट्रस्ट के दफ्तर भी पहुंची। टीम ने यहां से फाइलों के 16 बंडल कब्जे में लिए। मामले में आरोपित सुधांशु द्विवेदी और पीके गुप्ता के जेल में बयान भी दर्ज किए गए। ईओडब्ल्यू ने आरोपियों की कस्टडी रिमांड लेने के लिए अर्जी डाल दी है।

…तो कर्मचारियों के 2268 करोड़ रुपये न फंसते
बिजली कर्मचारियों के भविष्य निधि का पैसा गलत तरीके से डीएचएफएल में निवेश करने पर उपभोक्ता परिषद ने भी सवाल उठाए हैं। उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष अ‌वधेश कुमार वर्मा ने कहा कि डीएचएफएल में पहला निवेश 17 मार्च, 2017 को हुआ। इसके बाद 24 मार्च, 2017 को जब बोर्ड ऑफ ट्रस्ट की मीटिंग हुई।

उसमें 17 मार्च को हुए निवेश पर सवाल करने के बजाय बोर्ड ऑफ ट्रस्टी की मीटिंग में यह भी प्रस्ताव पास हुआ कि सचिव, ट्रस्ट केस टू केस बेसिस मामले में निदेशक वित्त से अनुमोदन लेंगे। अगर 24 मार्च, 2017 को ही बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव पर सवाल उठ जाता तो शायद बिजली कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई के 2268 करोड़ रुपये न फंसते।

 
 
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