UCC के विरोध में AIMPLB का राष्ट्रव्यापी अभियान आज से, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की नहीं मिली अनुमति

UCC के विरोध में AIMPLB का राष्ट्रव्यापी अभियान आज से, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की नहीं मिली अनुमति

नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर केंद्र सरकार की तैयारियों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) शासित राज्यों में इसे लागू करने की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने अपने राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरुआत का ऐलान किया है। बोर्ड ने 17 सितंबर से ‘भारत बचाओ-शरिया बचाओ अभियान’ शुरू करने की घोषणा की है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को कहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने की दिशा में काम किया जाएगा। उनके अनुसार, कई राज्यों में इसकी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है।

जंतर-मंतर की जगह प्रेस क्लब से शुरुआत

AIMPLB के घोषित कार्यक्रम के तहत अभियान को लेकर दिल्ली में गतिविधियां तेज हो गई हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बाद बोर्ड ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पत्रकार वार्ता के जरिए अभियान की रूपरेखा सार्वजनिक करने का फैसला किया है।

बोर्ड के पदाधिकारी और मुस्लिम समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधि प्रेस वार्ता में ‘संविधान बचाओ-शरिया बचाओ’ अभियान से जुड़े कार्यक्रमों और आगे की रणनीति की जानकारी देंगे।

UCC और वक्फ कानून पर विरोध

मुस्लिम संगठनों का कहना है कि UCC के साथ-साथ वक्फ कानून में किए गए बदलाव उनके धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े अधिकारों को प्रभावित करते हैं। AIMPLB ने इन मुद्दों को लेकर देशभर में जनसंपर्क और विरोध कार्यक्रम चलाने की बात कही है।

बोर्ड की ओर से यह भी कहा गया है कि विभिन्न राज्यों में जनसभाएं आयोजित की जाएंगी और राज्यपालों तथा जिला प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजे जाएंगे। साथ ही कानूनी विशेषज्ञों के साथ मिलकर संबंधित कानूनों और सरकारी फैसलों को अदालत में चुनौती देने की तैयारी की जाएगी।

वंदे मातरम् के मुद्दे पर भी आपत्ति

AIMPLB ने शैक्षणिक संस्थानों में वंदे मातरम् के सभी छह छंदों को अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव/व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई है। इन मुद्दों को लेकर बोर्ड विभिन्न विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों से संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, UCC के समर्थकों का तर्क है कि इससे अलग-अलग धर्मों के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में समान कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं। UCC को लेकर राजनीतिक दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं

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