अमित शाह का हिंदी प्रेम: राजभाषा से भारतीय भाषाओं के बीच सेतु तक
नई दिल्ली। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का हिंदी के प्रति लगाव केवल राजभाषा के औपचारिक प्रयोग तक सीमित नहीं है। मूल रूप से गुजरातीभाषी होने के बावजूद शाह सार्वजनिक जीवन और सरकारी कामकाज में हिंदी के व्यापक प्रयोग पर जोर देते रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के बीच संवाद और तकनीकी सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रहा है।
अमित शाह के नेतृत्व में सरकारी कामकाज में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, अनुवाद कार्य और हिंदी सलाहकार समितियों जैसी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाया गया है। उनका जोर हिंदी को प्रशासन के साथ-साथ शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और उच्च ज्ञान-विमर्श की सक्षम भाषा बनाने पर भी रहा है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली और मजबूत अनुवाद व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हिंदी दिवस से राजभाषा के विस्तार तक
हिंदी के प्रति अमित शाह का दृष्टिकोण लंबे समय से सार्वजनिक रूप से सामने आता रहा है। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ते हुए इसके महत्व पर बात की थी। वर्ष 2025 में भी हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में उन्होंने हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
पिछले एक वर्ष में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं को लेकर भी कई पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इससे राजभाषा विभाग के कार्यक्षेत्र का विस्तार हुआ है।
नराकास को प्रोत्साहन और नई पहल
नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकास के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की गई है। इसका उद्देश्य उन समितियों को प्रोत्साहित करना है, जो अपने क्षेत्रों में राजभाषा के प्रयोग और कार्यान्वयन को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।
तकनीक के क्षेत्र में भी राजभाषा विभाग ने कई नई पहल की हैं। ‘भारती-बहुभाषी अनुवाद सारथी’ के जरिए हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ जैसे शब्दकोश के माध्यम से विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्दों को हिंदी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इन पहलों का उद्देश्य हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं से अलग करना नहीं, बल्कि उनके बीच संवाद का माध्यम बनाना है। इससे राजभाषा का दायरा केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग तक सीमित न रहकर भाषा, तकनीक और भारतीय भाषाओं के बीच नए संबंध बनाने तक पहुंचता दिखाई देता है।
हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच सेतु की सोच
अमित शाह के हिंदी संबंधी दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हिंदी को भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी भाषा के बजाय उनके साथ चलने वाली भाषा के रूप में देखा जाए। हिंदी का विकास भारतीय भाषाओं के सम्मान, संरक्षण और परस्पर संवाद के साथ हो—यह दृष्टिकोण भारत की बहुभाषी वास्तविकता से जुड़ा हुआ है।
हिंदी की शक्ति उसकी आत्मीयता, समावेशिता और संवादधर्मिता में है। भारत में हिंदी का विस्तार तभी सार्थक हो सकता है, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और संवाद की भावना के साथ आगे बढ़े। भारतीय भाषाओं का इतिहास भी केवल प्रतिस्पर्धा का इतिहास नहीं रहा है। अलग-अलग भाषाओं ने एक-दूसरे से शब्द, मुहावरे, साहित्यिक संस्कार और विचार ग्रहण किए हैं।
हिंदी ने भी विभिन्न भारतीय भाषाओं से बड़ी संख्या में शब्द और अभिव्यक्तियां ग्रहण की हैं। दूसरी ओर हिंदी के माध्यम से अनेक भारतीय भाषाओं के साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिला है। इस दृष्टि से हिंदी को संपर्क और सेतु की भाषा के रूप में विकसित करने की संभावनाएं मौजूद हैं।
डिजिटल युग में हिंदी के सामने नए अवसर
अमित शाह की दृष्टि में हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी हुई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के दौर में हिंदी के सामने नए अवसर हैं।
यदि हिंदी में वैज्ञानिक, तकनीकी, दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान से जुड़ी उच्चस्तरीय सामग्री का व्यापक निर्माण होता है, तो वह ज्ञान-विमर्श की भाषा के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकती है। साथ ही यही तकनीक अन्य भारतीय भाषाओं के विकास और उनके साहित्य तथा ज्ञान को व्यापक स्तर तक पहुंचाने में भी उपयोगी हो सकती है।
दयानंद सरस्वती और गांधी की परंपरा से जुड़ता हिंदी आग्रह
अमित शाह उन गुजरातीभाषी व्यक्तित्वों की परंपरा में दिखाई देते हैं, जिन्होंने हिंदी को व्यापक जनसंवाद के माध्यम के रूप में महत्व दिया। इस संदर्भ में स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख किया जाता है।
स्वामी दयानंद सरस्वती संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद अपने सामाजिक और धार्मिक सुधार के विचारों को केवल संस्कृत के विद्वत वर्ग तक सीमित नहीं रखना चाहते थे। जनसाधारण तक अपने विचार पहुंचाने के लिए उन्होंने हिंदी का प्रयोग किया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ मूल रूप से हिंदी में लिखी गई।
महात्मा गांधी भी मूल रूप से गुजरातीभाषी थे, लेकिन उन्होंने हिंदी के माध्यम से राष्ट्रीय संवाद को व्यापक बनाने का प्रयास किया। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भी उन्होंने प्रयास किए और 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संवाद में भी हिंदी का व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। वे देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भारतीय समुदायों से संवाद करते समय हिंदी का इस्तेमाल करते रहे हैं और भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी जोर देते हैं।
जनभाषा, समावेशिता और संवाद
दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है—हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी।
हिंदी प्रेम का व्यापक रूप हिंदी को दूसरी भाषाओं पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध भाषायी आवाजों को एक-दूसरे तक पहुंचा सके। दयानंद सरस्वती ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने इसे राष्ट्रीय संवाद से जोड़ा और डिजिटल युग में हिंदी के सामने वैश्विक स्तर पर संवाद की नई संभावनाएं मौजूद हैं।
इस दृष्टि से हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा के विस्तार की यात्रा नहीं है। यह भारत में संवाद, जागरण और सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी यात्रा है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रखती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में हिंदी का भविष्य भी इसी समावेशी और संवादधर्मी दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है।
