‘आज के भारत को कल के आंकड़ों में ढालने की कोशिश…’, महिला आरक्षण पर सदन में बोलीं इकरा हसन
संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण पर गुरुवार (16 अप्रैल) को जमकर हंगामा देखने को मिला. इस दौरान समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने भी अपनी बात सदन में रखी. कैराना सांसद इकरा हसन ने कहा कि मैं बड़े ही दुख के साथ यह बात कहना चाहती हूं कि जो महिला विधेयक इस सरकार ने 2023 में पास किया था आज फिर से उसको लेकर आने की और उसको डीलिमिटेशन और सेंसस के आड़ में छुपाने की जो कोशिश की जा रही है.
कैराना सांसद ने कहा कि यह इस देश की महिलाओं के साथ इस सरकार का ये सरकार फिर से एक धोखा करने जा रही है. पहले 2034 में इन्होंने इसके इंप्लीमेंटेशन को कहा, अब भी इनकी नियत 2029 में इस बिल के इंप्लीमेंटेशन की नहीं है. यह चाहते हैं कि ये लोग सिर्फ डीलिमिटेशन और अपने हिसाब से करने जा रहे सेंस के आधार पे महिलाओं को उनके अधिकार देने से रोके, आज चिंता महिला आरक्षण की नहीं है. महिला आरक्षण बिल तो सर्वसहमति के साथ इसी सदन में 2023 में पास हो चुका है. चिंता इस बात की है कि आरक्षण की आड़ में मन मुताबिक डीलिमिटेशन से कैसे राजनीतिक लाभ उठाया जाए.
अचानक आई तत्परता महिलाओं के लिए नहीं है बल्कि चुनावी लाभ के लिए
सपा सांसद ने कहा कि साल 2023 में इसी सरकार ने देश को बताया था कि महिलाओं का आरक्षण केवल नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकता है. इसे न्याय और सटीकता के लिए आवश्यक बताया गया, लेकिन अब मात्र तीन वर्षों के भीतर वही सरकार कह रही है कि नई जनगणना की कोई आवश्यकता नहीं है. इन तीन वर्षों में ऐसा क्या बदल गया? क्या संविधान बदल गया? या सरकार की प्राथमिकताएं बदल गई? यह अचानक आई तत्परता महिलाओं के लिए नहीं है बल्कि चुनावी लाभ के लिए है.
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनावी प्रक्रिया चल रही है. इसीलिए सरकार का यह बदलाव किसी ठोस बुनियाद पर आधारित नहीं बल्कि शॉर्ट टर्म पॉलिटिकल माइलेज पर आधारित है. पहले कहा गया कि अपडेटेड आंकड़ों के बिना प्रतिनिधित्व अन्यायपूर्ण होगा और आज उसी सिद्धांत को नजर अंदाज किया जा रहा है. यह और कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ पॉलिटिकल अपॉर्चुनिज्म है. इस विधेयक की सबसे बड़ी खामी यह है कि सरकार जानबूझकर पुराने आंकड़ों का उपयोग करना चाह रही है.
आज के भारत को कल के आंकड़ों में ढालने की कोशिश- इकरा हसन
जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन सरकार उसे कराने में विफल रही और अब उस गलती को सुधारने की बजाय देश के प्रतिनिधित्व को 2011 के आंकड़ों पर चलाना चाहती है. जो 2029 में 18 साल पुराने हो जाएंगे, यह विधेयक आज के भारत को कल के आंकड़ों में ढालने की कोशिश है. जब नीति लोगों को वर्तमान उनके वर्तमान स्वरूप में देखना बंद कर देती है और उन्हें पुराने समय के आधार पर आंकती है तो वह केवल असत्य ही नहीं बल्कि अन्यायपूर्ण भी हो जाती है. हमारा संविधान एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करता है, आर्टिकल 82 यह सुनिश्चित करता है कि परिसीमन जनगणना के बाद हो और आर्टिकल 81 और 170 यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर हो ताकि हर वोट का सामान्य मूल्य रहे. लेकिन यह बिल सीधे एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को प्रभावित करता है.
आज सीमाएं तय करेंगी कि कौन किसका प्रतिनिधित्व करेगा- सपा सांसद इकरा हसन
सपा सांसद ने कहा कि स्थिति और चिंताजनक हो जाती है जब हम परिसीमन आयोग को दी जा रही शक्तियों का आकलन करते हैं. यह आयोग सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोनों का निर्णय करेगा और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस निर्णय को किसी भी न्यायालय में हम चुनौती नहीं दी जा सकती, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहां सत्ता पक्ष पूरे देश के पॉलिटिकल मैप को अपने लाभ के लिए बदल सकती है. वह भी बिना किसी न्यायिक निगरानी के इस शक्ति के दायरे को समझने की जरूरत है. आज सीमाएं तय करेंगी कि कौन किसका प्रतिनिधित्व करेगा. किस समुदाय की आवाज सुनी जाएगी और किसकी नहीं.
दस्य के बोलने का समय घटेगा- इकरा हसन
कैराना सांसद ने कहा कि डेमोक्रेसी में पावर के साथ-साथ चेक और बैलेंसेस होना बेहद जरूरी है. सरकार एक ऐसी संरचना बनाना जा रही है जहां पावर केंद्रित हो और जवाबदेही अनुपस्थित हो और जब इतनी व्यापक शक्तियां बिना किसी निगरानी के दी जाती है तो सर तो यह केवल एक तकनीकी चिंता नहीं रहती. यह प्रतिनिधित्व की निष्पक्षता को प्रभावित करती है. यह विधेयक लोकसभा की सदस्य संख्या को 50% बढ़ाने की बात करता है लेकिन इतनी बड़ी वृद्धि संसदीय कार्यप्रणाली में किसी सुधार के इस सदन की प्रभावशालीता को कम कर सकती है. एक सदस्य के बोलने का समय घटेगा, समितियों के संचालन को कठिन हो जाएगा और छोटे दलों के लिए अपनी बात रखना और चुनौतीपूर्ण होगा. मेरी मांग है कि सरकार संसदीय सत्रों के नंबरों को भी बढ़ाने का पहले गारंटी दें.
इस विधेयक की संरचना में एक गंभीर कमी- इकरा हसन
उन्होंने कहा कि महिलाएं कोई होमोजेनियस ग्रुप नहीं है, यह एक समान एक रूप समूह नहीं है. उनकी वास्तविकताएं जात वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि से निर्धारित होती हैं. फिर भी यह विधेयक इस वास्तविकता को नजरअंदाज करता है और पीडीए समुदाय विशेषकर ओबीसी महिलाओं को पूरी तरह बाहर कर देता है जो इस देश की बहुत बड़ी आबादी है. ये इस विधेयक की संरचना में एक गंभीर कमी है, सोचिए एक ऐसी युवा महिला जो पिछड़े वर्ग या अल्पसंख्यक परिवार से आती है जो अपने घर में पहली बार पढ़ाई कर रही है. पहली बार घर से बाहर निकलकर सार्वजनिक जीवन का सपना देख रही है, उसके पास ना संसाधन है ना नेटवर्क है ना राजनैतिक समाधान है. बिना उपकोटे के वह इस व्यवस्था में कैसे पार्टिसिपेट करेगी जहां पहले से ही असमानताएं मौजूद हैं. ओबीसी उपकोटे के बिना इस आरक्षण का लाभ पहले से ही सुविधा संपन्न वर्ग तक ही सीमित रहेगा.
ओबीसी महिलाओं को आरक्षण दिया जाए- सपा सांसद इकरा हसन
सपा सांसद ने कहा कि वंचित समुदाय की महिलाओं को एक बार फिर हासिए पर धकेल दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि नेता जी स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने हमेशा स्पष्ट रूप से कहा कि सामाजिक न्याय के बिना ओबीसी कोटे के बिना महिला आरक्षण का लाभ सिर्फ एक सीमित दायरे तक रह जाएगा. यदि सरकार महिलाओं के आरक्षण को जनसंख्या के आंकड़ों से जोड़ने पर तुली है तो आधी आबादी जिसे कहते हैं महिलाओं को उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी के साथ 48 से 39% आरक्षण देने का काम करें. महिला विधेयक को डीलिमिटेशन और सेंस से डीलिंग करके 29 में लागू किया जाए. ओबीसी महिलाओं को आरक्षण दिया जाए. देश की देश की रिलीजियस माइनॉरिटीज की महिलाओं को भी एक कोटा इसमें दिया जाना चाहिए और गरीब वर्ग की महिलाओं के लिए राज्य द्वारा चुनावी खर्च का प्रबंध किया जाए.
