राज्यों से क्यों मांगे गए धर्म के आधार पर आंकड़े? मच गया बवाल, विपक्ष फायर
केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई जनसांख्यिकीय बदलावों पर हाई लेवल कमेटी यानी HLCDC ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से बड़ी मात्रा में जानकारी मांगी है. इसमें पिछले 15 साल के जन्म, स्कूल में दाखिला, वाहन रजिस्ट्रेशन, वोटर रजिस्ट्रेशन और जमीन से जुड़े आंकड़े शामिल हैं. कई मामलों में समिति ने यह जानकारी धर्म के हिसाब से मांगी है.
राज्य सरकारों के अधिकारियों के अनुसार, इतनी जानकारी देना आसान नहीं है, क्योंकि कई सरकारी विभाग इस तरह का रिकॉर्ड धर्म के आधार पर नहीं रखते. कुछ मामलों में राज्य सरकारों के पास मांगी गई जानकारी उपलब्ध ही नहीं है. यह जानकारी सामने आने के बाद कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और समिति पर सवाल उठाए हैं.
जयराम रमेश ने क्या कहा?
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट में समिति के कामकाज पर सवाल उठाया. उन्होंने आरोप लगाया कि समिति का एजेंडा पहले से तय है और उसके पीछे पूर्वाग्रह दिखाई देता है. उन्होंने यह भी दावा किया कि समिति की रिपोर्ट पहले से तैयार हो सकती है. ये जयराम रमेश के राजनीतिक आरोप हैं. समिति की ओर से ऐसी किसी तैयार रिपोर्ट की पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है.
समिति ने राज्यों से क्या जानकारी मांगी?
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक समिति ने राज्यों से पिछले 15 साल के कई तरह के आंकड़े मांगे हैं. इनमें जन्म पंजीकरण, स्कूल में बच्चों के दाखिले, वाहनों का रजिस्ट्रेशन, वोटर ID और राशन कार्ड से जुड़ी जानकारी शामिल है. इसके अलावा अलग-अलग जिलों में मंदिर, मस्जिद, चर्च और दूसरे धार्मिक ढांचों की संख्या और उनकी जानकारी भी मांगी गई है.
समिति ने धार्मिक स्थलों की पहचान के लिए GIS मैपिंग जैसी तकनीक के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी भी मांगी है. समिति ने जमीन की खरीद-बिक्री, जमीन के मालिकाना हक में बदलाव और कुछ इलाकों में जमीन के असामान्य तरीके से जमा होने से जुड़ी जानकारी भी मांगी है.
‘लॉजिकल’ बदलाव और वोटर डेटा पर भी सवाल
समिति ने पिछले 15 साल में वोटर रजिस्ट्रेशन में हुए बदलावों की जानकारी भी मांगी है. इसमें ऐसे लोगों का डेटा शामिल करने को कहा गया है, जिनके पास पिछली पीढ़ी के जन्म प्रमाण पत्र या परिवार से जुड़े पुराने रिकॉर्ड नहीं हैं. इसके साथ ही आधार, वोटर ID और राशन कार्ड के रजिस्ट्रेशन में अचानक हुई बढ़ोतरी और फर्जी पहचान दस्तावेजों से जुड़े मामलों की जानकारी भी मांगी गई है.
समिति का सवाल उन इलाकों को लेकर भी है, जहां स्कूल में बच्चों की संख्या और वहां की पुरानी जन्म दर के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है. ऐसे मामलों में राज्य सरकारों से इसके कारण बताने को कहा गया है.
आदिवासी इलाकों और धर्म परिवर्तन की जानकारी भी मांगी
समिति ने अनुसूचित जनजाति यानी ST आबादी की धार्मिक संरचना में बदलाव से जुड़ी जानकारी भी मांगी है. इसमें आदिवासी समुदायों में धर्म परिवर्तन से जुड़ी सरकारी स्टडी, इंटेलिजेंस रिपोर्ट और आयोगों की रिपोर्ट शामिल हैं. इसके अलावा पांचवीं और छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों, सीमावर्ती जिलों, औद्योगिक इलाकों और तेजी से बढ़ रहे शहरों में जनसंख्या में बदलाव की जानकारी भी मांगी गई है.
बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों पर भी फोकस
समिति ने राज्यों से बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों से जुड़ी जानकारी भी मांगी है. इसमें ऐसे लोगों की पहचान, हिरासत, देश से बाहर भेजने की कार्रवाई और फर्जी दस्तावेजों से जुड़े मामले शामिल हैं. डिटेंशन सेंटर की जानकारी और ऐसे मामलों की भी जानकारी मांगी गई है, जिनमें बिना दस्तावेज वाले प्रवासियों का संबंध मानव तस्करी, नशीले पदार्थों या संगठित अपराध से बताया गया हो. समिति ने यह भी पूछा है कि अवैध प्रवास और अनधिकृत बसावट को रोकने के लिए राज्यों ने पिछले 15 साल में कौन से नियम, आदेश या कानून में बदलाव किए हैं.
मई 2026 में बनी थी कमेटी
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को हाई लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज का गठन किया था. इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर कर रहे हैं. समिति में जनगणना आयुक्त के अलावा रिटायर्ड IAS अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्रा, रिटायर्ड IPS अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव और अर्थशास्त्री शमिका रवि सदस्य हैं. गृह मंत्रालय के विदेशियों से जुड़े विभाग के संयुक्त सचिव को सदस्य सचिव बनाया गया है.
सरकार के मुताबिक समिति का काम अवैध घुसपैठ और दूसरे कारणों से होने वाले जनसांख्यिकीय बदलाव का अध्ययन करना और उससे निपटने के उपाय सुझाना है. समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों में असामान्य जनसंख्या बदलाव के पैटर्न का भी स्टडी करेगी. समिति को अपनी रिपोर्ट एक साल के भीतर देने का टारगेट दिया गया है, जिसे जरूरत पड़ने पर 6 महीने तक बढ़ाया जा सकता है.
राज्यों से जवाब लेने के लिए तैयार हुई थी सवालों की लिस्ट
समिति ने जुलाई में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जानकारी लेने के लिए एक डिटेल सवालों के लिस्ट तैयार की गई थी. गृह मंत्री अमित शाह के साथ हुई बैठक में समिति ने बताया था कि राज्यों के दौरे से पहले उनसे जरूरी जानकारी मांगी जाएगी, ताकि जमीन पर स्थिति को समझने में आसानी हो. अब सामने आई जानकारी के मुताबिक, कई राज्य सरकारों के लिए सभी सवालों का जवाब देना मुश्किल हो रहा है, खासकर वहां जहां विभागों के पास धर्म के आधार पर रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं.
सच्चर कमेटी से तुलना पर भी चर्चा
इस पूरे मामले में कांग्रेस की ओर से सच्चर कमेटी का भी जिक्र किया जा रहा है. सच्चर कमेटी का गठन 2005 में तत्कालीन UPA सरकार ने मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए किया था. 2006 में BJP ने सच्चर कमेटी की कुछ सिफारिशों का विरोध किया था और धार्मिक आधार पर इस तरह के आंकड़ों और सिफारिशों को लेकर सवाल उठाए थे. मौजूदा समय में HLCDC की ओर से मांगे गए धर्म आधारित आंकड़ों को लेकर भी राजनीतिक बहस शुरू हो गई है.
