लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़े दो सरकारी कर्मचारी बर्खास्त, LG मनोज सिन्हा ने लिया एक्शन

लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन से जुड़े दो सरकारी कर्मचारी बर्खास्त, LG मनोज सिन्हा ने लिया एक्शन

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने अपनी “आतंकवाद के प्रति जीरो-टॉलरेंस” नीति के तहत दो सरकारी कर्मचारियों की सेवा समाप्त कर दी है. ये बर्खास्तगी भारत के संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के तहत की गई हैं. यह कार्रवाई सरकारी तंत्र में घुसे आतंकवादियों को जड़ से खत्म करने के लिए चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है.

गौरतलब है कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाल ही में कहा था कि वह तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक सरकारी तंत्र के शरीर से आतंकवाद के इस कैंसर का आखिरी अंश भी पूरी तरह से निकाल नहीं दिया जाता. उन्होंने यह भी कसम खाई है कि सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद के इस अभिशाप को पूरी तरह से, निर्णायक रूप से और हमेशा के लिए खत्म कर देंगी.

फरहत आतंकवादी संगठन के लिए करता था काम

इन आतंकवादियों में से एक, फरहत अली खांडे, रामबन में शिक्षा विभाग में क्लास-IV का कर्मचारी था. असल में, फरहत आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम कर रहा था और अपनी सरकारी नौकरी का इस्तेमाल रामबन और आस-पास के इलाकों में आतंकवाद को फिर से ज़िंदा करने और एक बड़ा आतंकवादी नेटवर्क बनाने के लिए एक आड़ के तौर पर कर रहा था.

2011 में पहली बार खुफिया एजेंसियों की नजर में आया था फरहत

सूत्रों के मुताबिक, फरहत पहली बार 2011 में सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की नज़र में आया था, जब एक हवाला नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ था. इस नेटवर्क का काम मारे गए आतंकवादियों के परिवारों को पैसे बांटना था. बाद में, नई जानकारियों से पता चला कि जम्मू संभाग में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी नेटवर्क को फिर से जिंदा करने और उसे बनाए रखने के लिए आतंकवादी फंडिंग का इस्तेमाल किया जा रहा था.

सरकार को अप्रैल 2011 तक यह पता नहीं था कि फरहत हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम कर रहा था. उसका नाम अप्रैल 2011 में हिजबुल मुजाहिदीन के एक आतंकवादी से पूछताछ के दौरान सामने आया, जिसे जम्मू कश्मीर पुलिस ने 7 आतंकवादी परिवारों को आतंकी पैसा बांटने के आरोप में पकड़ा था.

जमानत मिलने के बाद भी जारी रहीं फरहत की आतंकी गतिविधियां

पुलिस ने फरहत को हिरासत में ले लिया और उसे जेल भेज दिया, लेकिन बाद में अक्टूबर 2011 में उसे जमानत मिल गई और उसने अपनी आतंकी गतिविधियां जारी रखीं. जांच में पता चला है कि फरहत ने कोई पछतावा या मन बदलने का कोई संकेत नहीं दिखाया.

सूत्रों की माने तो उसकी गतिविधियों पर नजर रखी गई और 2022 में एक विशेष अदालत में उसके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई. पता चला कि फरहत आतंकी गतिविधियों को आगे बढ़ाने और हिजबुल मुजाहिदीन के कैडरों को मजबूत करने के लिए स्थानीय आतंकवादी नेटवर्क से संपर्क बना रहा था. उसके मामले में विस्तृत जांच और एजेंसियों द्वारा जुटाई गई भारी जानकारी से पता चला कि फरहत आतंकवादियों के लिए एक मददगार और माध्यम के रूप में काम करता रहा.

शैक्षिक माहौल के भीतर एक आतंकवादी की मौजूदगी गंभीर चिंता का विषय है. इसके अलावा, वह सरकारी तंत्र का हिस्सा था, एक ऐसी संस्था जिसे जनता की सेवा करने और करदाताओं के पैसे का जिम्मेदारी से उपयोग करने का काम सौंपा गया है. सरकारी खजाने से वेतन लेते हुए, वह वास्तव में आतंकवादियों के लिए काम कर रहा था. किसी भी सभ्य समाज में यह एक अकल्पनीय विश्वासघात है.

चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को राज्यपाल ने किया बर्खास्त

सूत्रों ने आगे कहा उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा बर्खास्त किया गया एक और सरकारी कर्मचारी बांदीपोरा का मोहम्मद शफी डार है. वह ग्रामीण विकास विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में काम कर रहा था. उसकी नियुक्ति अनुकंपा के आधार पर उसके पिता की मृत्यु के बाद की गई थी, जो ग्रामीण विकास विभाग में प्लांटेशन वॉचर के रूप में काम करते थे.

जांच से पता चला कि मोहम्मद शफी डार लश्कर के एक आतंकी सहयोगी के रूप में काम कर रहा था और वह बांदीपोरा में सक्रिय लश्कर आतंकवादियों को लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल सहायता प्रदान कर रहा था.

सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान स्थित एक आतंकी संगठन ने शफी को आतंकियों के लिए सुरक्षित ठिकाने (सेफ हाउस) मुहैया कराने, उनकी आवाजाही और ट्रांसपोर्ट में मदद करने, पुलिस और सुरक्षा बलों की गतिविधियों और तैनाती से जुड़ी संवेदनशील जानकारी साझा करने, और उस इलाके में लश्कर का ओवर ग्राउंड नेटवर्क खड़ा करने का काम सौंपा था.

सूत्रों ने कहा, “अप्रैल 2025 में, शफी और उसका एक आतंकी साथी रईस अहमद डार एक संयुक्त नाके पर रूटीन जांच के दौरान पकड़े गए. शफी के पास से 01 AK-56 राइफल, ग्रेनेड और अन्य गोला-बारूद बरामद किया गया.”
जांच में आगे पता चला कि शफी सिर्फ एक मददगार से आगे बढ़कर एक सक्रिय ऑपरेशनल आतंकी सहयोगी बन गया था, और उसका नेटवर्क सुरक्षा बलों पर हमले की साज़िश रच रहा था.

सूत्रों ने आगे कहा, “सरकारी सेवा के दौरान अपने पिता के शहीद होने के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने वाले शफी ने उस रहम का बदला गद्दारी से चुकाया. आतंकवाद की राह पर उसका उतरना सिर्फ एक जुर्म नहीं है – यह उस राज्य के साथ एक निर्मम विश्वासघात है जिसने उसे पनाह दी और उसके परिवार का भरण-पोषण किया.”

सूत्रों ने यह भी बताया कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने पहले ही यह साबित कर दिया है कि वह इस मामले में पूरी गंभीरता से काम कर रहे हैं – आतंकवाद से जुड़े संबंधों वाले 90 से ज़्यादा सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है.