अयोध्या मामले पर कोर्ट रूम में उठा सवाल, क्या किसी और मस्जिद में देवताओं की आकृति मिली है?

 

खास बातें

  • अयोध्या मामले में छह अगस्त से अब तक 25 दिन हो चुकी है सुनवाई
  • चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही नियमित सुनवाई
  • यहां कोर्ट रूम लाइव में जानिए मंगलवार को हुई सुनवाई में किसने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अयोध्या मामले के पक्षकारों के वकीलों को यह बताने के लिए कहा है कि वे दलीलें पेश करने में और कितना वक्त लेंगे। कोर्ट ने सभी वकीलों को एकसाथ बैठक कर अनुमानित समय बताने के लिए भी कहा है। अब तक अयोध्या मामले में 25 दिन सुनवाई हो चुकी है। बता दें कि गत छह अगस्त से चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पीठ नियमित सुनवाई कर रही है। कोर्ट रूम लाइव में जानिए मंगलवार को हुई सुनवाई में किसने क्या कहा

संविधान पीठ: विवादित स्थल की तस्वीरों में भगवान, फूल-पत्तियां सहित अन्य कलाकृतियां हैं। इस पर आपका क्या कहना है?

राजीव धवन : पहले उस जगह हिंदू और मुस्लिम शांतिपूर्वक साथ रहते थे। कसौटी पिलर में देवता की आकृति नहीं है। उसमें कमल का चित्र अंकित है। खंभे में ऐसा कुछ नहीं जो भगवान या मूर्ति को दर्शाता हो। सवाल यह है कि यह खंभा क्या है? यह भगवान की आकृति का सीधा प्रमाण नहीं है। खंभा वहां कहां से आया और कौन लेकर आया, इन सवालों का जवाब मिलना बाकी है। खंभे पर कमल की आकृति होने से इसे गैर इस्लामी नहीं बताया जा सकता। कमल व फूल इस्लामी कला का हिस्सा हैं।

जस्टिस एसए बोबडे : क्या किसी अन्य मस्जिद में कमल या ऐसी आकृतियां हैं?

राजीव धवन : मस्जिद सिर्फ मुस्लिमों ने नहीं बनाई। हिंदू मजदूरों ने भी बनाई। ताजमहल को सिर्फ मुसलमानों ने नहीं बनाया। उसे भी हिंदू और मुस्लिम मजदूरों ने बनाया। कुतुब मीनार के पास की मस्जिद में ऐसी आकृति है। विवादित स्थल की पश्चिमी दीवार पर न कोई आकृति है और न कसौटी पिलर। मुस्लिम पश्चिम की ओर मुंह करके इबादत करते हैं।

संविधान पीठ : इस (1950 में लिए गए) चित्र में दो शेर और एक गरुड़ दिख रहे हैं। हम इसका और स्पष्ट चित्र देखना चाहते हैं। क्या मस्जिद में ऐसे फूल और पशुओं के चित्र अंकित होते हैं?

राजीव धवन : कुछ शेरों के चित्र, सिंहद्वार पर बने पक्षी के चित्र और कसौटी पिलर पर फूलों की आकृति यह साबित नहीं करतीं कि मस्जिद की जगह मंदिर था। हाईकोर्ट में हमसे इस बारे में जवाब नहीं मांगा गया था। तथ्य यह है कि वहां से कोई ऐसा साक्ष्य या चित्र नहीं मिला जिसमें देवता हों। कुछ मुस्लिम गवाह इसे नवाब का प्रतीक चिह्न बताते हैं और हिंदू गवाह इसके आधार पर वहां मंदिर होने का दावा करते हैं।

जस्टिस अशोक भूषण : हिंदू पक्षकारों का कहना है कि मंदिर का पिलर था। उसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई। द्वारपाल की भी तस्वीर थी।
राजीव धवन : जिन 14 कसौटी पिलर की बात कही जा रही है उनमें से किसी पर भगवान की कोई तस्वीर नहीं है। कमल की तस्वीर से कुछ साबित नहीं होता। ये सजावट के लिए हो सकता है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ : ऐसा सांस्कृतिक संगम के चलते भी हो सकता है। बाहर से आए धर्मों ने भारतीय आस्था के प्रतीकों को अंगीकार किया होगा।
राजीव धवन : बिल्कुल ऐसा हो सकता है, लेकिन दूसरा पक्ष इन चित्रों के माध्यम से यह साबित करना चाहता है कि वहां मंदिर था। यहां बहस मंदिर तोड़ने को लेकर है। सिर्फ चिह्न मिलने से देव स्थान होने की पुष्टि कैसे की जा सकती है? गौर करने की बात यह है कि अंदर प्रार्थना का तरीका कैसा था। सच्चाई यह है कि अंदर मस्जिद थी और बाहर राम चबूतरा। अंग्रेजों ने अलग दरवाजा बनाकर वहां अमन रखने की कोशिश की।

जस्टिस एसए बोबडे : क्या ऐसा साक्ष्य है जो चित्रों को सांस्कृतिक संगम साबित करे?
राजीव धवन : नहीं।

धवन ने पढ़ा इकबाल का शेर

सुनवाई के दौरान धवन ने इकबाल का शेर पढ़ा- है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज, अहल-ए-नजर समझते हैं उस को इमाम ए हिंद। उन्होंने कहा, इस बात से इनकार नहीं कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ, लेकिन क्या आस्था के आधार पर स्थान विशेष को कानूनी व्यक्ति माना जा सकता है?

शिया वक्फ बोर्ड का विरोध
धवन ने कहा, हम शिया वक्फ बोर्ड की उस दलील का विरोध करते हैं जिसमें जमीन मंदिर के लिए देने की बात कही गई है। संपत्ति सुन्नी वक्फ बोर्ड की है। 1885 के बाद वहां दोनों समुदाय के लोग इबादत करते थे। अंदर के आंगन में कभी पूजा नहीं हुई। बाहरी आंगन में बने राम चबूतरे पर पूजा होती थी।

 
 

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