शासन-प्रशासन की गलत नीति के चलते टकराव का कारण बन सकता है शामली-अम्बला ग्रीन बैल्ट हाइवे

  • किसानों की भूमि को बंजर बताकर मुआवजा देने में आनाकानी कर रहे जिले के प्रशासनिक अधिकारी

गंगोह। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना शामली-अम्बाला ग्रीन बैल्ट हाइवे में सैंकड़ों वर्षों से खेती कर रहे किसानों की भूमि अधिग्रहण को लेकर शासन-प्रशासन की गलत नीति के चलते टकराव के आसार बनते जा रहे हैं क्योंकि एक ओर जहां जिला प्रशासन किसानों को मुआवजा नहीं देना चाह रहा है, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी पीडि़त किसानों को उद्वेलित कर रही है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित शामली-अम्बाला ग्रीन बैल्ट हाइवे को लेकर शासन-प्रशासन की गलत नीति के कारण सैंकड़ों वर्षों जो किसान अपनी भूमि पर खेती कर रही हैं तथा उन गांवों की चकबंदी होने के बाद उनके खेतों की अदला-बदली हो गई थी। अब शासन-प्रशासन उस भूमि को बंजर व बंजर ढाक की भूमि का नाम देकर सरकारी भूमि बता रहा है। आखिर वह किसान जिनकी तीन तीन पीढिया उस भूमि को संवारने में गुजर गई वह शासन प्रशासन को मुफ्त में बिना मुआवजा दिये कैसे दे देगे क्योंकि शासन प्रशासन ने हाईवे ओथरटी से भूमि का सारा पैसा ले लिया है लेकिन अब किसानों को देने में आनाकानी कर रहा है

चकबंदी के एक चकबंदी अधिकारी ने राजस्व परिषद को ऐसी रिपोर्ट भेज दी जिससे सारा मामला उलझ गया है किसान परेशान होकर शासन-प्रशासन तथा नेताओं के चक्कर काट रहे हैं लेकिन उनका कोई समाधान करने को तैयार नहीं है उल्लेखनीय बात यह है की क्षेत्रीय सांसद व विधायक इस समस्या से जानबूझकर अंजान बने हुए हैं शायद उन्हें 2024 में टरडक मोहम्मदपुर गुज्जर बालू महंगी राम राय खेड़ी सांगा खेड़ा कलसी व भोगी माजरा के किसानों की वोट की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जनप्रतिनिधि इस समस्या को बहुत हल्के में ले रहे हैं तथा प्रदेश के मुख्यमंत्री आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी को वस्तुस्थिति से अवगत नहीं करा रहे हैं कई किसान हाई कोर्ट में जाने की तैयारी कर रहे हैं वहीं कई किसान जो गरीब है वे शासन-प्रशासन के चक्कर काट रहे हैं नए जिलाधिकारी श्री दिनेश चंद्र से किसानों को बहुत आशा थी तथा उन्होंने आश्वासन भी दिया था कि आपको न्याय दिलाया जाएगा लेकिन कल नकुड के ब्लॉक सभागार में हुई बैठक में जिलाधिकारी ने किसानों को कोई आश्वासन नहीं दिया बल्कि अपने पहले आश्वासन से भी मना कर दिया जिसके कारण आधा दर्जन गांव के किसान मायूस होकर वापस लौट आए

यहां उल्लेखनीय बात यह है कि जिस बंजर भूमि को सरकार की नीतियों के चलते गरीब लोगों को पट्टे दिए थे तथा 12 साल बाद उनको संक्रमणी भूमिधर मान लिया वही उस जमीन की चकबंदी में अदला बदली हो गई पत्ट्टेदार की भूमि किसानों पर चली गई तथा किसानों की भूमि पट्टे दार पर चली गई वही वह भूमि तीन चार बार बिक चुकी है ऐसे में जिन किसानों ने भूमि खरीदी है या चकबंदी में चक की अदला बदली हुई है उन किसानों का क्या दोष है जब सरकार पट्टेदार को भूमि का मालिक बना चुकी है फिर उसे मुफ्त में कैसे ले सकती है क्षेत्र में यह समस्या बहुत विकराल रूप धारण कर सकती है किसान सड़कों पर आकर आत्महत्या व बुलडोजर के नीचे आने को तैयार बैठे हैं लेकिन शासन-प्रशासन अभी इंतजार कर रहा है हमारे जनप्रतिनिधियों को तत्काल कोई बीच का रास्ता निकाल कर किसानों को उनकी भूमिका का मुआवजा दिलाना चाहिए