यूपी के शिक्षामित्रों को लेकर सियासत तेज, भाजपा के नैरेटिव को बदलने के लिए सपा ने चला दांव
लखनऊ। वर्ष 2027 के पहले राजनीतिक दलों के बीच नैरेटिव बदलने और बनाए रखने की जंग तेज हो गई है। भाजपा, विपक्ष खासकर सपा द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों को कमजोर कर बड़ी लकीर खींचने के प्रयास में जुटी है। योगी सरकार द्वारा शिक्षामित्रों के मानदेय में की गई आठ हजार की एकमुश्त बढ़ोतरी इसी रणनीति का हिस्सा है।
इसके सहारे भाजपा, शिक्षामित्रों सहित शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच समर्थन का ताना-बाना तो बुन ही रही है, इससे सपा द्वारा स्कूलों के विलय से लेकर शिक्षकों के अधिकारों को लेकर उठाए जा रहे सवालों को निरुत्तर करने की कोशिश में है। इस जोखिम से बचने के लिए सपा मानदेय बढ़ोतरी का नैरेटिव बदलने में जुटी है। उसके द्वारा सरकार के फैसले पर ‘राहत बनाम हक’ की बहस तेज करने की कोशिश हो रही है।
शिक्षमित्रों का मुद्दा राजनीतिक दलों के एजेंडे में रहा है। कल्याण सिंह सरकार ने वर्ष 1999 में इनकी नियुक्ति की थी। वर्ष 2005 में मुलायम सरकार ने इनका मानदेय 2400 रुपये किया, फिर वर्ष 2007 में मायावती सरकार ने इसे तीन हजार रुपये प्रतिमाह किया था।
इसके बाद से शिक्षामित्र मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे थे और सपा सरकार पर लगातार सवाल खड़े कर रही थी। अब योगी सरकार ने मानदेय 18 हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया है। प्रदेश में वर्तमान में 1,42,929 शिक्षामित्र नियुक्त हैं।
इसके जरिए भाजपा ने एक बड़े वर्ग को साधने और प्राथमिक शिक्षा के मुद्दे पर सपा की आक्रामकता को कम करने की कोशिश की है। शिक्षामित्र न केवल खुद वोटर हैं, बल्कि अपने परिवार और सामाजिक नेटवर्क के सहारे कई सीटों पर चुनावी माहौल प्रभावित कर सकते हैं।
सपा ने पूर्व में परिषदीय स्कूलों के विलय के मुद्दे पर पीडीए पाठशालाओं के सहारे भाजपा के विरुद्ध माहौल बनाने की कोशिश की थी। अब मानदेय बढ़ोतरी के बाद सपा अपने नैरेटिव को बनाए रखना चाहती है।
बुधवार को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक्स पर शिक्षामित्रों के नया खुला पत्र लिखकर यही संदेश दिया था। याद दिलाने और समझाने की कोशिश की है कि सपा सरकार ने ही उनको शिक्षक बनाया था। रणनीति शिक्षामित्रों के भीतर मौजूद असंतोष को खत्म न होने देने की है। इसके लिए सपा शिक्षक सभा को सक्रिय कर दिया गया है।
संदेश दिया जा रहा है कि उनके साथ न्याय केवल सपा ही कर सकती है। ऐसे में अब यह मुद्दा सिर्फ वेतन का नहीं, बल्कि सम्मान, स्थायित्व व भरोसे का बनता जा रहा है और यही तय करेगा कि शिक्षामित्र किसके साथ खड़े होंगे।
