बच्चों तक पहुंची किडनी की बीमारी, पहचान लीजिए लक्षण

 

प्रिंस शर्मा परीक्षा हॉल में अपनी आंसर शीट खाली छोड़ देता था। उसका खाने-पीने की चीजों से भी मोहभंग होने लगता था। अगर कुछ जबरदस्ती खिलाया जाता तो वह उल्टी कर देता था। दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलता तो रन लेने के दौरान या तो बैलेंस बिगड़ने की वजह से गिर जाता या फिर उसके घुटने ही जवाब दे जाते थे।

कमोठ के रहने वाले इस बच्चे ने 6 साल तक यह पीड़ा सही, लेकिन स्थानीय डॉक्टर भी उसके लक्षण देख परेशानी का पता नहीं लगा पाए। प्रिंस के पिता कहते हैं, ‘जब जांच के बाद भी डॉक्टरों के हाथ कुछ नहीं लगता था तो वे हमसे कहते थे कि हमें चिंता करने की जरूरत नहीं है। हमारे बेटे को कुछ परेशानी नहीं है और वह बस नखरे करता है।’

प्रिंस की सेहत बिगड़ती चली गई और फिर तीन महीने पहले उसे गिरगांव स्थित सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल लाया गया। यहां नेफ्रोलॉजी ऐंड किडनी ट्रांसप्लांट फिजिशन और कंसल्टेंट डॉ श्रुति तपियावाला ने प्रिंस के कुछ टेस्ट किए, जिसमें गंभीर परिणाम सामने आया। उन्होंने बताया, ‘क्रैटिनाइन का काउंट 0.6mg/dL होना चाहिए था लेकिन वह 8mg/dL से भी ज्यादा था। प्रिंस एंड स्टेज किडनी डिजीज से पीड़ित था जो क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) की आखिरी स्टेज होती है। हमें तुरंत ही उसे डायलिसिस पर रखना पड़ा।’

डॉक्टरों का कहना है कि जहां प्रिंस का मामला परिवार के डॉक्टरों द्वारा लक्षणों को बताने के गलत तरीके से फैलने का एक दुर्लभ उदाहरण हो सकता है, वहीं सिरदर्द, लगातार थकान, खराब शैक्षणिक प्रदर्शन और भूख कम लगना किडनी की गंभीर बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल की नेफ्रोलॉजिस्ट और सलाहकार बाल रोग विशेषज्ञ डॉ किरण साठे ने कहा, ‘जरूरी नहीं कि बच्चों में लाल यूरिन पास करने या कम यूरिन पास करने या फिर पूरे शरीर पर सूजन जैसे लक्षण दिखने पर ही किडनी डिजीज के बारे में पता चले। ऐसे बच्चों का विकास सही तरह से नहीं हो पाता, उन्हें भूख भी कम लगती है। हड्डियों में परेशानी आने लगती है और बहुत ज्यादा थकान महसूस होने लगती है। इसलिए जरूरी है कि किडनी से संबंधित बीमारी के मामले में लक्षणों को देखें और समय-समय पर जांच कराते रहें।’

प्रिंस के केस में कोई यह पता नहीं लगा पाया कि उसे असल में हुआ क्या था। जब वह घर पहुंचा तो उसका सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था, लेकिन उसके पैरंट्स को लगा कि वह बाहर धूप में खेलकर आया है इसलिए ऐसा हो रहा है। डॉ तपियावाला ने कहा, ‘उसकी फैमिली ने पुरजोर कोशिश की। उन्हें इस बात पर यकीन हो गया था कि प्रिंस को कुछ भी नहीं हुआ है क्योंकि स्थानीय डॉक्टरों ने भी उन्हें ऐसा ही विश्वास दिला दिया था। लेकिन वे बार-बार प्रिंस की हालत देखकर चौंक रहे थे।’

डॉ. ने आगे कहा, ‘चूंकि प्रिंस ढंग से खा नहीं पाता था इसलिए उसके परिवार ने उसे बर्गर, फ्राइज, नाचोज़ और पिज्जा जैसे जंक फूड खिलाना शुरू किया। लेकिन उसका ऐपिटाइट नहीं सुधरा और उसकी ग्रोथ पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा। उसका वजन बढ़ना भी रुक गया। एक बार उसके अंकल दुबई से एक तरह का प्रोटीन पाउडर लेकर आए और उसे कई महीनों तक खिलाया। लेकिन उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उस प्रोटीन पाउडर से प्रिंस की सेहत पर कितना बुरा असर पड़ रहा था।’

दुर्भाग्य की बात तो यह है कि प्रिंस के फैमिली डॉक्टरों ने उसका कोई ब्लड टेस्ट भी नहीं करवाया जोकि आमतौर पर ऐसी स्थिति में हर डॉक्टर करवाता है। डॉ. तपियावाला के मुताबिक, ‘जब प्रिंस को हमारे पास लाया गया तब वह उल्टियां कर रहा था और बार-बार गिर रहा था। फैमिली के पास दो ही विकल्प थे। या तो नई किडनी या फिर जिंदगीभर के लिए डायलिसिस। प्रिंस की मां किडनी देने के लिए तैयार हुईं और अब हम जल्द ही सर्जरी करें व प्रिंस जल्द ही ठीक हो जाएगा।’

‘जब पहली बार प्रिंस का डायलिसिस हुआ तो उसने अपनी बायॉलजी की किताब से एक पोर्शन सुनाना शुरू कर दिया। प्रिंस काफी ब्राइट है, लेकिन यूरिमिक एन्सेफलॉपथी से पीड़ित होने के चलते स्कूल में उसकी परफॉर्मेंस पर भी फर्क पड़ रहा था।’

डॉ. साठे कहती हैं कि हमारे देश में बच्चों में किडनी की बीमारियों का पता लगाने की प्रक्रिया में सुधार हो रहा है और इसके लिए जागरूकता व बेहतर डायग्नोस्टिक सुविधाएं जिम्मेदार हैं। हालांकि इनका समय पर पता चलना और इलाज बेहद जरूरी है नहीं तो बच्चे की ग्रोथ पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही इसमें बच्चों की किडनी हमेशा के लिए खराब हो सकती है। जो बच्चे क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित होते हैं, उनका रेग्युलर डायलिसिस के बिना रह पाना मुश्किल हो जाता है।’

डॉ तपियावाला के मुताबिक, आजकल बच्चों में बदलते लाइफस्टाइल की वजह से भी किडनी से संबंधित बीमारियां जन्म ले रही हैं। जो बच्चे ज्यादा प्रोसेस्ड फूड खाते हैं और अन्य बच्चों के साथ मैदान में नहीं खेलते, उनमें न सिर्फ डायबीटीज की संभावना रहती है बल्कि वे मोटापे और हाई बीपी के भी शिकार हो जाते हैं। आज क्रॉनिक किडनी डिजीज भारत में बेहद आम हो गई है। हर 10 में से 1 व्यक्ति इससे पीड़ित है।

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