कई राज्‍यों में हिंदू हुए अल्‍पसंख्‍यक, फिर भी सरकार से मिलने वाली सुविधाओं से वंचित

 

[अश्विनी उपाध्याय]। भारत में अल्पसंख्यक शब्द की अवधारणा ब्रिटिशकालीन है। सन 1899 में तत्कालीन ब्रिटिश जनगणना आयुक्त द्वारा कहा गया था कि भारत में सिख,जैन, बौद्ध, मुस्लिम को छोड़कर हिंदु बहुसंख्यक हैं। यहीं से अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद के विमर्श को बल मिलने लगा। संविधान निर्माण के लिए जब संविधान सभा बैठी तब ‘अल्पसंख्यक’ के मुद्दे पर जोरदार बहस हुई। 26 मई 1949 को संविधान सभा में अल्पसंख्यक आरक्षण पर बहस के दौरान अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने के प्रश्न पर आम राय थी लेकिन अल्पसंख्यक आरक्षण पर आम राय नहीं बन पा रही थी। (Hindu Minority)

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने साफ किया कि पंथ/आस्था/मजहब/धर्म आधारित आरक्षण गलत है। उस समय तक अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान हो चुका था। बिहार के वरिष्ठ नेता और संविधान सभा के सदस्य तजम्मुल हुसैन ने जोर देकर कहा था कि ‘हम अल्पसंख्यक नहीं हैं’। अल्पसंख्यक शब्द अंग्रेजों का निकाला हुआ है। अंग्रेज यहां से चले गए, अब इस शब्द को डिक्शनरी से हटा दीजिए। अब हिंदुस्तान में कोई अल्पसंख्यक वर्ग नहीं रह गया है।’ तजम्मुल हुसैन के भाषण के इस अंश पर सभा में खूब वाहवाही हुई थी।

संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उन लोगों के लिए कुछ अलग से प्रावधान किया जो भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं। इस अनुच्छेद में ‘अल्पसंख्यक’ कौन है, इसकी परिभाषा नहीं निकलती। यहां पर एक तथ्य और गौर करने लायक है कि संविधान निर्माताओं को अल्पसंख्यक आयोग के गठन की जरूरत नहीं महसूस हुई थी। लेकिन राजनीति को इसकी जरूरत थी, लिहाजा सरकार ने 12 जनवरी 1978 को अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। इस आयोग के गठन का आधार अल्पसंख्यकों से भेदभाव, उनकी सुरक्षा, देश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को बनाए रखने और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना था।

संसद द्वारा 1992 के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग बनाया गया। इस एक्ट में भी अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं तय की गई। यह आयोग सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए लागू की जाने वाली योजनाओं और नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू करने पर नजर रखता है। इसी अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का असीमित अधिकार है।

यह भी जानना रोचक है कि किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की विधि बहुत जटिल है और यह काम केवल संसद ही कर सकती है (अनुच्छेद 341-342)। लेकिन किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का काम सरकारी दफ्तर से भी हो सकता है। इसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर 1993 को एक अधिसूचना के जरिये पांच समुदायों मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया। 27 जनवरी 2014 को तत्कालीन संप्रग सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इसी कानून के तहत जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक के रूप में अधिसूचित कर दिया।

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2006 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में कहा था, ‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमान विकास में बराबरी से फायदा ले सकें, हमें मौलिक योजना बनानी पड़ेगी। संसाधनों पर उनका पहला हक होना चाहिए’। मनमोहन सिंह ने तो ‘अल्पसंख्यक’ का मतलब ही मुसलमान मान लिया था लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी देश में अल्पसंख्यक कौन है यह तय नहीं हो पाया है।

‘अल्पसंख्यक’ की सटीक व्याख्या और परिभाषा नहीं होने की वजह से इसका बड़े स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है। मिसाल के तौर पर 2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में 68 फीसद जनसंख्या मुसलमानों की है। अत: जनसंख्या के आधार पर इस राज्य में मुसलमान किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं कहे जा सकते हैं। लेकिन वहां, अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सारी सहूलियतें इन्हें मिलती हैं। जबकि वहां हंिदूू समुदाय जो वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक है, उन सुविधाओं से महरूम है। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह मामला केवल जम्मू-कश्मीर तक ही सीमित है।

अगर ध्यान से देखें तो भारत के तमाम हिस्सों में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किए जाने की वजह से किसी न किसी समुदाय के साथ अन्याय हो रहा है। 2011 के जनसंख्या आकड़ों के मुताबिक देश के आठ राज्यों लक्षद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हंिदूू अल्संख्यक हैं लेकिन उनके अल्पसंख्यक के अधिकार बहुसंख्यकों को मिल रहे हैं।

अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद उसके सदस्यों को अल्पसंख्यकों के लिए कल्याण कार्यRमों और छात्रवृत्तियों में केंद्रीय मदद मिलती है। वे अपने शैक्षिक संस्थान भी चला सकते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू कश्मीर में वर्ष 2016-17 में अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित प्री-मैटिक स्कॉलरशिप का फायदा जिन छात्रों को मिला है उनमें 1 लाख 5 हजार से अधिक छात्र मुसलमान समुदाय से आते हैं जबकि सिख, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म के 5 हजार छात्रों को इसका फायदा मिल सका है। इसमें भी हिंदु समुदाय के किसी भी छात्र को इसका फायदा नहीं मिला है।

जम्मू कश्मीर में तकनीकी शिक्षा में 20,000 रुपये छात्रवृत्ति दी जाती है। राज्य में मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद सरकार ने वहां 753 में से 717 छात्रवृत्ति मुस्लिम छात्रों को आवंटित की हैं एक भी हिंदु को छात्रवृत्ति नहीं दी गई है। ऐसे में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के मायने और उसकी परिभाषा को दुरुस्त किया जाना अपरिहार्य हो जाता है।

टीएमए पई मामले में संविधान पीठ कहा है कि अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर की जाए न कि राष्ट्रीय स्तर पर। क्योंकि कई राज्यों में जो वर्ग बहुसंख्यक हैं उन्हें अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है। यह विषमता तभी दूर होगी जब अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर हो। दूसरा उपाय यह है कि अल्पसंख्यक की परिभाषा और अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशानिर्देश तय हों, ताकि यह सुनिश्चित हो कि सिर्फ उन्हीं अल्पसंख्यकों को संविधान के अनुच्छेद 29-30 में अधिकार और संरक्षण मिलेगा जो वास्तव में धार्मिक और भाषाई, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली न हों और जो संख्या में बहुत कम हों।

सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों की संविधान पीठ ने 2002 में निर्देश दिया था कि अल्पसंख्यक की पहचान राष्ट्रीय स्तर की बजाय राज्य स्तर पर की जाए। क्योंकि कई राज्यों में जो वर्ग बहुसंख्यक हैं उन्हें अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है और जो वास्तव में अल्पसंख्यक है उसे बहुसंख्यक माना जा रहा है। 2005 सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने कहा था कि धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की अवधारणा देश की एकता और अखंडता के लिए बहुत खतरनाक है इसलिए जितना जल्दी हो सके, अल्पसंख्यक आयोग को भंग कर देना चाहिए। 2007 में पंजाब हाईकोर्ट ने पंजाब में सिखों को अल्पसंख्यक का दर्जा समाप्त कर दिया था और वह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

संविधान में सभी नागरिकों को बराबर अधिकार मिला हुआ है, इसलिए अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर समाज का विभाजन बंद किया जाए अन्यथा दूसरा उपाय यह है कि अल्पसंख्यक की परिभाषा और राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा निर्देश तय हों और यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल उसी समुदाय को संविधान के अनुच्छेद 29-30 का संरक्षण मिले जो वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हो और संख्या में नगण्य अर्थात एक फीसद से कम हों।

(लेखक राज्य की आबादी के आधार पर अल्पसंख्यक को परिभाषित करने की मांग के याचिकाकर्त्ता हैं।)

संविधान में विधान
भारतीय संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ चार बार ही किया गया है। खास बात यह है कि संविधान में इस शब्द के मायने नहीं तय किये गए हैं। नीति-निर्माण करने वाली देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद और विधानसभाओं में होने वाली बहस से यह समझा जा सकता है कि अल्पसंख्यक उस समुदाय को कहते हैं जो संख्या में उस क्षेत्र विशेष के बहुसंख्यक लोगों से कम होते हैं।

इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के मुताबिक अल्पसंख्यक उन समूहों को कहते हैं जिनकी उत्पत्ति का स्थान, भाषा या धर्म एक जैसे हैं, लेकिन उस क्षेत्र के रहने वाले लोगों से अलग हैं। 1950 में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार पर आधारित पुस्तक में अल्पसंख्यक को गैर प्रमुख समूह बताया है जिनका धर्म और भाषाई संस्कार वहां के बहुसंख्यक लोगों से अलग है।

सुनिश्चित हैं विशेषाधिकार

अनुच्छेद 29 और 30 की शुरुआती भूमिका और अनुच्छेद 30 की धारा (1) और (2) में इसका जिक्र मिलता है। अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है। इसके मुताबिक देश के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले किसी भी समुदाय को अपनी भाषा, शैली और परंपराओं के संरक्षण का अधिकार होगा। किसी नागरिक को अपने धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर राज्य सरकार द्वारा संचालित या राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त किसी शिक्षण संस्थान में प्रवेश देने से मना नहीं किया जाएगा।

अनुच्छेद 30(1) में अल्पसंख्यकों को दो अधिकार दिए गए हैं। ये हैं अपनी मर्जी के शिक्षण संस्थान का निर्माण करना और उन्हें संचालित करना। अनुच्छेद 30(2) यह सुनिश्चित करता है कि कोई सरकार शिक्षण संस्थानों को मदद देने में इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगी कि वह संस्थान किसी भाषागत या धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित है। इस अनुच्छेद के तहत देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी गई है।

 

 
 
Top