JNU: चर्चा में VC की पीड़ित भाव पर टिप्पणी, बोलीं- ‘विक्टिम कार्ड खेलकर आगे नहीं बढ़ सकता समाज’
वाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री डी. पंडित ने हाल ही में एक इंटरव्यू में सामाजिक न्याय, पहचान आधारित राजनीति और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर अपने विचार रखे. उनके बयान का एक हिस्सा विशेष रूप से चर्चा में है, जिसमें उन्होंने ‘स्थायी पीड़ित भाव’ (permanent victimhood) पर टिप्पणी की.
इस इंटरव्यू के दौरान स्थायी पीड़ित भाव पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वहां एक स्थायी पीड़ित पकड़ है. आप स्थायी रूप से पीड़ित बनकर या विक्टिम कार्ड खेलकर तरक्की नहीं कर सकते. यह अश्वेतों के लिए किया गया था. यही चीज दलित के लिए लाई गई थी और किसी को शैतान बनाकर तरक्की करना आसान नहीं है.
पीड़ित भाव को लेकर क्या बोलीं प्रोफेसर?
कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री डी. पंडित ने आगे कहा कि यह एक अस्थायी प्रकार की दवा है. अस्थायी रूप से यह कहने की कोशिश करना कि यह दुश्मन है, आप इस पर चिल्लाते हैं और फिर आपको अच्छा लगता है.
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज या समुदाय के लिए लगातार स्वयं को पीड़ित मानते रहना प्रगति में बाधा बन सकता है. उनके अनुसार, जब किसी समूह को बार-बार यह बताया जाता है कि उसकी समस्याओं का कारण कोई ‘दुश्मन’ है, तो यह सोच लंबे समय तक समाधान नहीं दे सकती.
पीड़ित भाव को बताया ‘अस्थायी नशा’
कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री डी. पंडित ने पीड़ित भाव को ‘अस्थायी प्रकार का नशा’ बताया है. जिसमें एक विरोधी पक्ष की पहचान कर भावनात्मक प्रतिक्रिया दी जाती है और उससे कुछ समय के लिए संतोष महसूस होता है.
कुलपति की यह टिप्पणी व्यापक चर्चा के दौरान आई, जिसमें शिक्षा नीति, सामाजिक न्याय और पहचान आधारित राजनीति जैसे विषय शामिल थे. उन्होंने कहा कि समाज में स्थायी परिवर्तन के लिए सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की भावना जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि केवल किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने से समाधान संभव नहीं होता.
UGC के नए नियमों पर क्या कहा?
इसी साक्षात्कार में कुलपति ने UGC के हाल में लाए गए नियमों पर भी अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि इन नियमों को पर्याप्त चर्चा के बिना लागू किया गया. उनके अनुसार मसौदा व्यापक रूप से साझा नहीं किया गया. इसके लिए विश्वविद्यालयों और संबंधित पक्षों से पर्याप्त सुझाव नहीं लिए गए.
उन्होंने आगे कहा कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले विस्तृत विचार-विमर्श जरूरी होता है. कुलपति ने कहा कि अगर कोई नियम समानता के नाम पर असमानता की स्थिति पैदा करे, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी नीति को बनाते समय संतुलन बनाए रखना चाहिए, ताकि किसी एक समूह को अतिरिक्त अधिकार देते समय दूसरे समूह के साथ अन्याय न हो.
सामाजिक न्याय पर उनका दृष्टिकोण
कुलपति ने सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भी अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय का उद्देश्य अवसरों की समानता सुनिश्चित करना होना चाहिए. उनका कहना था कि ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना आवश्यक है, लेकिन समाज को आगे बढ़ने के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण भी अपनाना चाहिए. उन्होंने कहा कि केवल भावनात्मक अपील या विरोध के आधार पर नीतियां बनाने से स्थायी समाधान नहीं निकलता.
छात्रसंघ से जुड़े 5 छात्रों को निष्कासित करने पर क्या कहा?
विश्वविद्यालय प्रशासन ने हाल ही में छात्रसंघ से जुड़े पांच छात्रों को दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित (हॉस्टल खाली करने और अकादमिक गतिविधियों से अस्थायी निष्कासन) कर दिया है. साथ ही प्रत्येक पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है.
यह कार्रवाई विश्वविद्यालय की अंबेडकर लाइब्रेरी में स्थापित की गई फेसियल रिकग्निशन (चेहरा पहचान) प्रणाली को तोड़े जाने के मामले में की गई है. निष्कासित किए गए छात्रों के मुद्दे पर कुलपति ने कहा कि अंबेडकर लाइब्रेरी में पिछले कई वर्षों से यह शिकायत मिल रही थी कि बाहरी लोग आकर पढ़ने की जगह घेर लेते हैं, जिससे JNU के छात्रों को देर से आने पर सीट नहीं मिलती और कई बार विवाद की स्थिति बनती है.
छात्रों ने दिए थे ज्ञापन
छात्रों और छात्रसंघ की ओर से इस संबंध में कई ज्ञापन भी दिए गए थे. इसी समस्या के समाधान के लिए प्रशासन ने फेसियल रिकग्निशन तकनीक लगाने का निर्णय लिया. कुलपति के अनुसार, इस पर लगभग चार साल तक चर्चा हुई और पर्याप्त फण्ड की व्यवस्था करने के बाद इसे लागू किया गया.
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की फीस बेहद कम है और संस्थान पूरी तरह केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय के सहयोग से चलता है, इसलिए संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करना जरूरी है. उनका कहना था कि तकनीक का उपयोग छात्रों की सुविधा के लिए किया गया था, लेकिन छात्रसंघ ने इसे निजता का उल्लंघन बताया. कुलपति ने यह भी कहा कि आज आधार कार्ड और मोबाइल फोन में भी फेसियल रिकग्निशन का उपयोग होता है, इसलिए इस मुद्दे पर उठाई गई आपत्ति को वह समझ नहीं पाईं.
शिक्षा व्यवस्था और विश्वविद्यालयों की भूमिका
कुलपति ने शिक्षा व्यवस्था पर भी विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में बुनियादी शोध को मजबूत करना आवश्यक है. उनके अनुसार राज्य विश्वविद्यालयों को पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए. उच्च शिक्षा में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बनी रहनी चाहिए. शिक्षा संस्थानों को विविध विचारों के लिए खुला मंच होना चाहिए. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का मुख्य उद्देश्य ज्ञान, शोध और बौद्धिक विमर्श को आगे बढ़ाना है.
पहचान आधारित राजनीति पर विचार
कुलपति ने पहचान आधारित राजनीति और विचारधारात्मक बहसों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि विचारों की शक्ति बहुत प्रभावशाली होती है और शिक्षा संस्थानों में संतुलित चर्चा जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों को किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों के लिए खुला रहना चाहिए.
