कांशीराम जयंती पर अखिलेश यादव ने किया ‘PDA दिवस’ का ऐलान, नाराज मायावती बोलीं- ‘परिवार दल अलायंस’
कांशीराम की जयंती को “PDA दिवस” के रूप में मनाने की यूपी के पूर्व सीएम व समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख की घोषणा के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है. इस मुद्दे पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल मीडिया पर तीखा जवाब दिया है, जिसके बाद प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है.
बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि, जब सपा की सरकार थी, तब मान्यवर कांशीराम की जयंती पर घोषित अवकाश को निरस्त कर दिया गया था. इतना ही नहीं, बहन जी द्वारा बनाए गए जिले “मान्यवर श्री कांशीराम नगर” का नाम भी बदल दिया गया. उन्होंने सवाल उठाया कि जो पार्टी उनके नाम से बने ज़िले को स्वीकार नहीं कर पाई, वह उनकी विचारधारा को कैसे लागू करेगी.
सपा के ‘PDA’ पर बसपा का तंज
बसपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांशीराम जी के नाम पर चल रही कई योजनाओं को भी सपा सरकार में बंद किया गया. उन्होंने सपा के PDA पर तंज कसते हुए कहा कि उनके अनुसार PDA का मतलब “परिवार दल अलायंस” है. उन्होंने कहा कि सपा में परिवारवाद हावी है और लोकसभा चुनाव में अधिकतर टिकट परिवार के लोगों को ही दिए गए.
‘लोकसभा चुनाव में बसपा को मिला उल्लेखनीय समर्थन’
उन्होंने दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने अकेले चुनाव लड़ते हुए भी अंबेडकर नगर, लालगंज, चंदौली और बांदा समेत कई सीटों पर दो से ढाई लाख तक वोट हासिल किए. उनका कहना था कि उस समय एक ओर 38 दलों का NDA और दूसरी ओर 28 दलों का INDIA गठबंधन था, फिर भी बसपा को उल्लेखनीय समर्थन मिला.
‘सपा की ड्रामेबाजी में नहीं आने वाला बहुजन समाज’
विश्वनाथ पाल ने यह भी कहा कि बहुजन समाज अब जागरूक हो चुका है और सपा की “ड्रामेबाज़ी” में आने वाला नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि सपा शासनकाल में डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़े स्थलों को लेकर भी विवादित बयान दिए गए थे, जिससे बहुजन समाज की भावनाएं आहत हुईं. वहीं 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर उन्होंने कहा कि बसपा सर्व समाज को साथ लेकर गठबंधन की रणनीति के तहत सरकार बनाने की तैयारी में है.
वहीं भाजपा द्वारा अयोध्या में PDA समाज से जिलाध्यक्ष चुने जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि सभी दलों को समाज के विभिन्न वर्गों को भागीदारी देनी चाहिए, जिसकी शुरुआत बहुजन समाज पार्टी ने “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के सिद्धांत के साथ की थी.
